नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज (NCDEX) ने भारत का पहला एक्सचेंज-ट्रेडेड वेदर डेरिवेटिव 'RAINMUMBAI' लॉन्च किया है। यह नया प्रोडक्ट मुंबई में बारिश की अनिश्चितताओं से जूझ रहे व्यवसायों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करेगा। यह कॉन्ट्रैक्ट बारिश में होने वाले उतार-चढ़ाव पर आधारित होगा, जो सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान से बचाने का एक जरिया बनेगा।
अब बारिश के जोखिम से मिलेगा 'इंश्योरेंस'!
नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज (NCDEX) ने जलवायु जोखिमों (Climate Risks) को मैनेज करने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। एक्सचेंज ने 'RAINMUMBAI' नाम का एक नया फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट लॉन्च किया है, जो मुंबई में होने वाली बारिश की अनिश्चितताओं के खिलाफ वित्तीय सुरक्षा कवच का काम करेगा। यह भारत का पहला एक्सचेंज-ट्रेडेड वेदर डेरिवेटिव है।
कैसे काम करेगा RAINMUMBAI?
यह प्रोडक्ट सीधे तौर पर मौसम के इंडेक्स से जुड़ा है। 'RAINMUMBAI' कॉन्ट्रैक्ट मुंबई में होने वाली कुल बारिश के डेविएशन (Deviation) यानी अंतर को ट्रैक करेगा। इसकी गणना भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के सेंटाक्रूज और कोलाबा ऑब्जर्वेटरी से मिले रियल-टाइम बारिश के आंकड़ों और शहर के ऐतिहासिक औसत बारिश के बीच अंतर के आधार पर की जाएगी। IMD के अनुसार, मुंबई का औसत बारिश का बेंचमार्क 2,206.7 मिलीमीटर है, जो 1991 से 2020 तक के आंकड़ों पर आधारित है। जून से सितंबर तक हर महीने के लिए अलग-अलग फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट होंगे, जिससे मार्केट पार्टिसिपेंट्स सीजन के अलग-अलग हिस्सों के लिए अपने वित्तीय जोखिम को मैनेज कर सकेंगे।
मुंबई को ही क्यों चुना गया?
NCDEX ने मुंबई को इस पायलट प्रोजेक्ट के लिए इसलिए चुना क्योंकि यह शहर एक प्रमुख फाइनेंशियल हब है और मॉनसून की अस्थिरता से सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। यहां के कई बिजनेसेज के लिए अत्यधिक या बहुत कम बारिश सीधे तौर पर रेवेन्यू और प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित करती है। इसके अलावा, मुंबई में स्थापित ऑब्जर्वेटरीज से मिलने वाला विश्वसनीय मौसम डेटा इस इंडेक्स को पारदर्शी और भरोसेमंद बनाने के लिए जरूरी था। NCDEX की योजना इस पायलट के सफल होने के बाद इसे दूसरे शहरों या तापमान, हवा और नमी जैसे दूसरे वेदर वेरिएबल्स के लिए भी एक्सपैंड करने की है।
निवेशकों के लिए जोखिम और चुनौतियां
हालांकि, इस नए प्रोडक्ट की सफलता कुछ फैक्टर्स पर निर्भर करेगी। सबसे पहली चुनौती है मार्केट लिक्विडिटी (Market Liquidity), जिसके लिए पर्याप्त पार्टिसिपेंट्स (Hedgers, Speculators, Market Makers) का होना जरूरी है। दूसरी चुनौती है बेसिस रिस्क (Basis Risk), जो तब पैदा होती है जब इंडेक्स के लिए इस्तेमाल किया गया लोकल वेदर डेटा किसी बिजनेस की साइट पर हो रहे वास्तविक मौसम से मेल नहीं खाता। यह पारंपरिक इंश्योरेंस की तरह नहीं है, इसलिए कंपनियों को इन फाइनेंशियल डेरिवेटिव्स को समझने और इस्तेमाल करने के लिए नई क्षमताएं विकसित करनी होंगी। पारंपरिक इंश्योरेंस या सरकारी मदद से हटकर मार्केट-बेस्ड फाइनेंशियल टूल्स को अपनाने की प्रक्रिया इस प्रोडक्ट की लॉन्ग-टर्म कामयाबी के लिए अहम साबित होगी।
