भारतीय म्यूचुअल फंड्स (Mutual Funds) अब सिर्फ सोना और चांदी तक सीमित नहीं रहेंगे। स्पेशल पर्पज इन्वेस्टमेंट फंड्स (SIFs) का इस्तेमाल कर फंड हाउसेज सोने-चांदी के अलावा कई दूसरी कमोडिटीज़ (Commodities) में निवेश का दायरा बढ़ा रहे हैं। इस कदम से रिटेल निवेशकों को आर्बिट्राज (Arbitrage) और ट्रेडिंग की नई रणनीतियां मिलेंगी, लेकिन कमोडिटी मार्केट की अस्थिरता और जोखिमों को समझना भी जरूरी होगा।
कमोडिटी में निवेश का बदला नज़रिया
भारतीय म्यूचुअल फंड्स (Mutual Funds) कमोडिटीज़ (Commodities) में निवेश को लेकर अपना नज़रिया बदल रहे हैं। अभी तक ये फंड्स ज़्यादातर फिजिकल गोल्ड (Physical Gold) या सिल्वर (Silver) में ही निवेश करते थे, जिन्हें सेफ हेवन (Safe Haven) या महंगाई से बचाव का ज़रिया माना जाता था। लेकिन अब, स्पेशल पर्पज इन्वेस्टमेंट फंड्स (SIFs) का इस्तेमाल करके फंड हाउसेज कमोडिटी बाज़ार में ज़्यादा सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं और अलग-अलग एसेट्स (Assets) में निवेश का रास्ता खोल रहे हैं।
रेगुलेटरी बदलावों का असर
यह बदलाव रेगुलेटरी (Regulatory) बदलावों से भी मज़बूती पा रहा है। 1 अप्रैल, 2026 से MF Lite और SIF कैटेगरी को मिलाने से एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (Asset Management Companies) के लिए ऐसे फंड्स बनाना आसान हो गया है जो कमोडिटी डेरिवेटिव्स (Commodity Derivatives) जैसे फ्यूचर्स (Futures) और ऑप्शन्स (Options) में निवेश कर सकें। इससे फंड मैनेजर्स पैसिव होल्डिंग्स (Passive Holdings) से आगे बढ़कर आर्बिट्राज (Arbitrage) जैसी स्ट्रेटेजी अपना सकते हैं, जिसका मकसद बाज़ार में कीमतों के अंतर से मुनाफा कमाना होता है।
पैसिव फंड्स का बढ़ता दबदबा
मार्केट डेटा (Market Data) के अनुसार, जुलाई 2026 तक पैसिव फंड इंडस्ट्री करीब ₹15.15 लाख करोड़ का मैनेजमेंट कर रही है। इसमें कमोडिटी-फोक्स्ड पैसिव फंड्स का हिस्सा ₹2.51 लाख करोड़ है। हालांकि, पारंपरिक गोल्ड ईटीएफ (Gold ETF) में निवेशकों की दिलचस्पी थोड़ी कम होती दिख रही है। जुलाई 2026 में गोल्ड ईटीएफ इनफ्लो घटकर ₹1,558 करोड़ रह गया, जो जून में ₹3,443 करोड़ था। यह बताता है कि निवेशक शायद मौजूदा माहौल में ज़्यादा विविध या बेहतर परफॉरमेंस वाले विकल्पों की तलाश में हैं।
नए प्रोडक्ट और ब्रॉड पब्लिक के लिए मौके
Edelweiss Mutual Fund और Tata Mutual Fund जैसे फंड हाउसेज इन नई संभावनाओं को तलाश रहे हैं। इनका लक्ष्य उन जटिल कमोडिटी स्ट्रेटेजीज़ को आम रिटेल निवेशकों तक पहुंचाना है, जो पहले सिर्फ हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स (High-Net-Worth Individuals) या इंस्टीट्यूशनल प्लेयर्स (Institutional Players) तक सीमित थीं। SEBI (सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) गैर-एग्रीकल्चरल कमोडिटी डेरिवेटिव्स, जैसे क्रूड ऑयल, नेचुरल गैस और बेस मेटल्स में फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (Foreign Portfolio Investors) की पहुंच बढ़ाने के प्रस्तावों पर भी विचार कर रहा है, जिससे इन बाज़ारों में लिक्विडिटी (Liquidity) और प्राइस डिस्कवरी (Price Discovery) में सुधार हो सकता है।
जोखिमों पर भी दें ध्यान
हालांकि, निवेशकों को इस बदलाव के साथ आने वाले जोखिमों पर भी गौर करना चाहिए। फिजिकल गोल्ड के विपरीत, जो अक्सर लॉन्ग-टर्म स्थिरता के लिए रखा जाता है, व्यापक कमोडिटी बाज़ार काफी साइक्लिकल (Cyclical) और वोलेटाइल (Volatile) होते हैं। एनर्जी और बेस मेटल्स की कीमतें अक्सर ग्लोबल जियोपॉलिटिकल (Geopolitical) घटनाओं, सप्लाई चेन (Supply Chain) में रुकावटों और मांग के बदलते पैटर्न पर तेज़ी से प्रतिक्रिया करती हैं।
कमोडिटी डेरिवेटिव्स को संभालने में ऑपरेशनल चुनौतियां (Operational Challenges) भी हैं, जैसे वेयरहाउस रजिस्ट्रेशन (Warehouse Registration) और फिजिकल डिलीवरी (Physical Delivery) की प्रक्रियाएं, जिन्हें रेगुलेटर सुव्यवस्थित करने पर काम कर रहा है। आम निवेशक के लिए, इसका मतलब है कि इन क्षेत्रों पर केंद्रित फंड्स में इक्विटी (Equity) या डेट (Debt) स्कीम्स की तुलना में अलग तरह के रिस्क प्रोफाइल होंगे। इन नए ऑफर्स की सफलता फंड मैनेजर्स की बाज़ार की अस्थिरता को नेविगेट करने और डेरिवेटिव्स की ऑपरेशनल जटिलताओं को मैनेज करने की क्षमता पर निर्भर करेगी। निवेशकों को भविष्य में आने वाले प्रोडक्ट लॉन्चेस और फंड्स द्वारा अपनाई जाने वाली खास स्ट्रेटेजीज़, चाहे वह आर्बिट्राज हो या डायरेक्ट कमोडिटी एक्सपोजर, पर नज़र रखनी चाहिए।
