माइनिंग सेक्टर के लिए पानी एक बड़ा सिरदर्द बनता जा रहा है। इंटरनेशनल काउंसिल ऑन माइनिंग एंड मेटल्स (ICMM) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में लगभग **66%** माइनिंग साइट्स पानी की कमी, सूखा और बाढ़ जैसे गंभीर जल जोखिमों का सामना कर रही हैं। यह स्थिति इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) और रिन्यूएबल एनर्जी टेक्नोलॉजी के लिए ज़रूरी क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई चेन के लिए एक बड़ा खतरा पैदा करती है।
Detailed Coverage
दो-तिहाई माइनिंग साइट्स पानी के जोखिम में
ICMM की एक विस्तृत एनालिसिस से पता चला है कि माइनिंग इंडस्ट्री एक गंभीर चुनौती के मुहाने पर खड़ी है। रिपोर्ट जो 22 जुलाई, 2026 को पब्लिश हुई, उसने 148 देशों के 12,000 से ज़्यादा साइट्स का डेटा खंगाला। इसमें पाया गया कि 65.7% ऑपरेशन्स पानी की कमी (water scarcity), सूखे (drought) और अप्रत्याशित बाढ़ (flooding) जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। भारतीय निवेशकों के लिए यह डेटा खास तौर पर मायने रखता है, क्योंकि रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि मध्य भारत जैसे क्षेत्र कंपाउंड वॉटर हैज़र्ड्स (compound water hazards) का सामना कर रहे हैं, जहाँ कई जलवायु संबंधी जोखिम एक साथ मौजूद हैं।
क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई पर असर
माइनिंग सेक्टर ग्लोबल एनर्जी ट्रांज़िशन (energy transition) का आधार है। यह इलेक्ट्रिक व्हीकल बैटरी, सोलर पैनल और विंड इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ज़रूरी मिनरल्स मुहैया कराता है। रिपोर्ट आगाह करती है कि पानी की ये बाधाएं इन अहम रिसोर्सेज के प्रोडक्शन को रोक सकती हैं। पहचाने गए जोखिमों में, बेसलाइन वॉटर स्ट्रेस (baseline water stress) - जहाँ पानी की मांग उपलब्ध सप्लाई से ज़्यादा है - सबसे आम है, जो दुनिया भर में लगभग 38% माइनिंग साइट्स को प्रभावित कर रहा है। इसके अलावा, सूखे की स्थिति 27% फैसिलिटी को प्रभावित करती है, जिसमें अफ्रीका और मध्य पूर्व जैसे क्षेत्र गंभीर रूप से प्रभावित हैं।
कमोडिटी और रीजन के हिसाब से रिस्क
जल जोखिम (water risks) भौगोलिक स्थिति और माइन किए जा रहे मटेरियल के प्रकार के आधार पर काफी भिन्न होते हैं। जहाँ सूखा और पानी का तनाव व्यापक हैं, वहीं बाढ़ का जोखिम लगभग 14% माइनिंग ऑपरेशन्स को प्रभावित करता है। डेटा बताता है कि एल्युमिना (alumina), एल्युमिनियम (aluminum), स्टील (steel) और मोलिब्डेनम (molybdenum) के प्रोडक्शन साइट्स बाढ़ के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं। इसके अलावा, इंटर-एनुअल वेरिएबिलिटी (inter-annual variability) - यानी एक साल से दूसरे साल पानी की सप्लाई की अप्रत्याशितता - दुनिया भर में 16% साइट्स को प्रभावित करती है, जिसमें ओशिनिया (Oceania) 74% एक्सपोज़र के साथ सबसे ऊपर है। ये उतार-चढ़ाव कंपनियों के लिए लॉन्ग-टर्म कैपिटल स्पेंडिंग (capital spending) और प्रोडक्शन टारगेट की योजना बनाना मुश्किल बना देते हैं, क्योंकि पानी की उपलब्धता कम भरोसेमंद होती जा रही है।
निवेशक का नज़रिया और मॉनिटरिंग
निवेशकों के लिए, ये निष्कर्ष इस बात पर ज़ोर देते हैं कि जल प्रबंधन (water management) अब सिर्फ एक पर्यावरण संबंधी चिंता नहीं, बल्कि एक बड़ा वित्तीय जोखिम (financial risk) बन गया है। पानी के खराब प्रबंधन से ऑपरेशन बंद हो सकते हैं, पानी के ट्रीटमेंट का खर्च बढ़ सकता है और रेगुलेटरी बाधाएं आ सकती हैं। जैसे-जैसे क्रिटिकल मिनरल्स की ग्लोबल डिमांड बनी हुई है, वे कंपनियां जो अपने ऑपरेशन्स में एडवांस्ड वॉटर-सेविंग टेक्नोलॉजी (water-saving technologies) को शामिल करने में विफल रहती हैं, उन्हें उच्च एक्ज़ीक्यूशन रिस्क (execution risks) और मार्जिन प्रेशर (margin pressure) का सामना करना पड़ सकता है। निवेशकों को भविष्य की अर्निंग कॉल्स (earnings calls) में मैनेजमेंट से पानी के जोखिम को कम करने की रणनीतियों, डिसैलिनेशन (desalination) या रीसाइक्लिंग इंफ्रास्ट्रक्चर (recycling infrastructure) में निवेश और साइट-स्पेसिफिक वॉटर स्ट्रेस मैनेजमेंट प्लान (water stress management plans) के बारे में जानकारी लेनी चाहिए। माइनिंग फर्मों की विश्वसनीय जल स्रोतों को सुरक्षित करने की क्षमता, दुनिया के हरित ऊर्जा की ओर बढ़ने के साथ प्रोजेक्ट टाइमलाइन को पूरा करने में एक महत्वपूर्ण कारक होगी।
