Precious Metal ETFs: मार्जिन हटने से गोल्ड-सिल्वर ETFs में जोरदार तेजी, पर ये बातें जानना भी ज़रूरी!

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AuthorMehul Desai|Published at:
Precious Metal ETFs: मार्जिन हटने से गोल्ड-सिल्वर ETFs में जोरदार तेजी, पर ये बातें जानना भी ज़रूरी!
Overview

भारत में गोल्ड और सिल्वर ETFs (Precious Metal ETFs) के निवेशकों के लिए अच्छी खबर है। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) ने मार्जिन की अतिरिक्त ज़रूरतें खत्म कर दी हैं, जिसके बाद इन ETFs में खरीदारी बढ़ी है और कीमतों में अच्छा उछाल देखा गया है।

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मार्जिन से मिली राहत, बुलियन ETFs में आई जान

बुधवार को प्रेशियस मेटल ETFs की चाल में तेजी की मुख्य वजह भारत के मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का बड़ा फैसला रहा। इन एक्सचेंजों ने गोल्ड और सिल्वर फ्यूचर्स पर लगी अतिरिक्त मार्जिन की ज़रूरतों को वापस ले लिया है। 19 फरवरी से लागू हुए इस नियम के तहत, पहले गोल्ड फ्यूचर्स पर 3% और सिल्वर फ्यूचर्स पर 7% अतिरिक्त मार्जिन देना पड़ता था, जिसे अब हटा दिया गया है। इस फैसले से बुलियन बाज़ारों में लिक्विडिटी (Liquidity) बढ़ने और ट्रेडिंग वॉल्यूम (Trading Volume) में इज़ाफ़ा होने की उम्मीद है।

इस राहत के चलते सिल्वर ETFs में 4.2% तक की तेजी देखी गई, जबकि गोल्ड ETFs में लगभग 0.30% की मामूली बढ़त दर्ज हुई। यह तेज़ी तब आई जब अमेरिकी डॉलर (US Dollar) एक हफ्ते के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया था। आमतौर पर, डॉलर के मजबूत होने से डॉलर-डिनॉमिनेटेड कमोडिटीज़ (Dollar-denominated commodities) की मांग घट जाती है, क्योंकि वे विदेशी खरीदारों के लिए महंगी हो जाती हैं।

MCX पर, अप्रैल में डिलीवरी वाले गोल्ड फ्यूचर्स करीब ₹1,56,130 प्रति 10 ग्राम पर कारोबार कर रहे थे, जो 0.24% ऊपर था। वहीं, अप्रैल में डिलीवरी वाले सिल्वर फ्यूचर्स में लगभग 0.40% की बढ़ोतरी हुई और ये करीब ₹2,48,550 प्रति किलोग्राम पर पहुंच गए। MCX सिल्वर मिनी कॉन्ट्रैक्ट्स में भी 4.20% की तेज़ी दिखी। फिजिकल मार्केट में भी 24K सोने की कीमतें करीब 0.29% बढ़कर ₹1,56,490 प्रति 10 ग्राम के आसपास रहीं। हालांकि, गोल्ड इस समय एक कंसॉलिडेशन फेज (Consolidation phase) में है और फरवरी में अपने रिकॉर्ड हाई (जो ₹1,80,000 के पार थे) से लगभग 2.55% नीचे आ चुका है। सिल्वर में भी फरवरी के हाई से बड़ी गिरावट आई है।

अंदरूनी मजबूती और बने हुए मैक्रो हेडविंड्स (Macro Headwinds)

हालांकि मार्जिन में राहत मिलने से शॉर्ट-टर्म (short-term) बूस्ट मिला है, लेकिन प्रेशियस मेटल्स का ब्रॉडर आउटलुक (broader outlook) बड़े मैक्रोइकॉनोमिक फ़ोर्सेज़ (macroeconomic forces) से तय हो रहा है। ग्लोबल गोल्ड ETFs में काफी ग्रोथ देखी गई है। फरवरी 2026 तक, उनके एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) का अनुमान $530 बिलियन तक पहुंच गया था, जो पिछले महीने से 5% ज़्यादा था, और इसमें रिकॉर्ड 3,932 टन सोना था। भारत में, जनवरी 2026 तक सिल्वर ETFs का AUM ₹1.16 लाख करोड़ के पार चला गया, जो पिछले महीने से 61% की भारी बढ़ोतरी थी। इन इंस्ट्रूमेंट्स में निवेशकों का रुझान बढ़ा है, क्योंकि वे डाइवर्सिफिकेशन (diversification) और ग्लोबल अनिश्चितताओं (global uncertainties) से बचाव चाहते हैं। एक्सपर्ट्स 2026 के लिए अच्छी परफॉर्मेंस का अनुमान लगा रहे हैं, कुछ संस्थानों ने तो गोल्ड के टारगेट प्राइस को $4,300-$5,000/oz से बढ़ाकर $5,500-$6,300/oz तक कर दिया है। सेंट्रल बैंक (Central banks) लगातार गोल्ड खरीद रहे हैं, जो 2023 में 1950 के बाद सबसे ज़्यादा रही, क्योंकि संस्थाएं डॉलर-डिनॉमिनेटेड एसेट्स से दूरी बना रही हैं।

हालांकि, अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (97.7474 के आसपास) में हालिया मजबूती, जो पिछले साल 8.11% कमज़ोर हुआ था और मिड-2022 के हाई से 15% नीचे है, वो गोल्ड और सिल्वर की कीमतों के लिए आमतौर पर सपोर्टिव (supportive) होती है। लेकिन, फेडरल रिज़र्व (Federal Reserve) की पॉलिसी का रास्ता अभी भी एक बड़ी अनिश्चितता बना हुआ है। जनवरी की मीटिंग के मिनट्स (minutes) से पता चला कि नीति निर्माताओं के बीच मतभेद हैं। कुछ का मानना है कि अगर महंगाई कम होती रही तो वे और भी राहत देंगे, जबकि कुछ लगातार बढ़ती महंगाई को लेकर सतर्क हैं और उनका मानना है कि दरें ऊंची रह सकती हैं या उन्हें बढ़ाया भी जा सकता है। जनवरी 2026 में कोर सीपीआई (2.5%) में नरमी के बावजूद, महंगाई अभी भी स्टिकी (sticky) बनी हुई है, खासकर कोर सर्विसेज (core services) में, जिसके पूरे साल 3% के करीब रहने की उम्मीद है।

बियर केस (Bear Case): वोलेटिलिटी (Volatility) और मैक्रो संदेह

प्रेशियस मेटल्स में हालिया बड़ी प्राइस की चालें (price swings) उनकी इनहेरेंट वोलेटिलिटी (inherent volatility) को दिखाती हैं। सिल्वर ने 31 जनवरी 2026 को अपने इतिहास की सबसे बड़ी सिंगल-डे बिकवाली (sell-off) देखी, जो 2025 में 170% की रैली के बाद 27% गिर गया और अब अपने रिकॉर्ड हाई से 42% नीचे है। गोल्ड में भी करेक्शन आया है, जो अपने पीक से लगभग 20% नीचे है। मार्जिन की ज़रूरतें कम होने से ट्रेडिंग की लागत भले ही कम हो जाए, लेकिन यह डॉलर के मज़बूत होने, फेड के बंटे हुए रुख और महंगाई के टारगेट से ऊपर रहने की संभावना जैसे जोखिमों को मौलिक रूप से नहीं बदलता है। ऐतिहासिक तौर पर, एक्सचेंजों द्वारा मार्जिन बढ़ाना (जैसे फरवरी 2026 की शुरुआत में हुआ था) लिक्विडेशन (liquidations) को मजबूर करके बिकवाली के दबाव को बढ़ा सकता है। 18-19 फरवरी 2026 को डॉलर के अचानक बढ़ने पर बाजार की प्रतिक्रिया, जो मजबूत इकोनॉमिक डेटा और हॉकिश फेड सिग्नल्स (hawkish Fed signals) के कारण हुई थी, इन मैक्रो शिफ्ट्स (macro shifts) के प्रति प्रेशियस मेटल्स की संवेदनशीलता को उजागर करती है। ये प्राइस एक्शन बताता है कि मार्जिन से मिली राहत, ट्रेडर्स के लिए भले ही अच्छी हो, पर यह एक स्थायी बुलिश मोमेंटम (bullish momentum) का संकेत न होकर, एक अस्थायी राहत हो सकती है, खासकर मध्य पूर्व में जियोपॉलिटिकल टेंशन (geopolitical tensions) और ईरान को लेकर चिंताएं फिर से उभरने के साथ। माइनिंग स्टॉक्स (mining stocks) में भी हालिया मजबूती के बावजूद, इंडस्ट्री-विशिष्ट जोखिम हैं।

आउटलुक (Outlook) और स्ट्रक्चरल सपोर्ट (Structural Support)

आगे देखें तो, प्रेशियस मेटल्स के लिए लॉन्ग-टर्म बुलिश स्ट्रक्चर (long-term bullish structure) को सेंट्रल बैंक की लगातार खरीदारी, डी-डॉलराइजेशन (de-dollarization) के रुझान और सिल्वर की मजबूत इंडस्ट्रियल डिमांड (industrial demand), खासकर रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर (renewable energy sector) जैसे सोलर पावर और इलेक्ट्रिक वाहनों से, सपोर्ट मिल रहा है। मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि नियर-टर्म वोलेटिलिटी (near-term volatility) के बावजूद, ब्रॉडर ट्रेंड (broader trend) बरकरार है। LKP Securities के जितेन त्रिवेदी का मानना है कि गोल्ड CME पर $4,850 के करीब सपोर्ट बना रहा है, जिसे $5,000 के ऊपर जाने पर ही नई बुलिश मोमेंटम मिल सकती है, जबकि MCX पर ₹1,55,000 के करीब रेजिस्टेंस (resistance) दिख रहा है। Lemonn Markets Desk के गौरव गर्ग भी सावधानी से ट्रेडिंग करने की सलाह देते हैं, लेकिन यह भी नोट करते हैं कि सेफ-हेवन डिमांड (safe-haven demand) और सेंट्रल बैंक की लगातार खरीदारी डिप्स (dips) पर अंडरलाइंग सपोर्ट (underlying support) प्रदान करती है, जिससे वर्तमान माहौल को ट्रेंड ब्रेकडाउन (trend breakdown) के बजाय एक करेक्शन फेज (corrective phase) के अंदर कंसॉलिडेशन (consolidation) के रूप में देखा जा रहा है।

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