कर्नाटक और महाराष्ट्र में सूखे के कारण भारत के खरीफ मक्के के उत्पादन में **17%** की भारी गिरावट आई है। चूंकि पोल्ट्री उत्पादन में फीड (चारा) की लागत का हिस्सा **70%** होता है, इसलिए कच्चे माल की बढ़ती कीमतों से पोल्ट्री कंपनियों के मार्जिन पर गहरा असर पड़ सकता है।
एग्रीकल्चर सेक्टर इन दिनों भारी सप्लाई संकट से जूझ रहा है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, खरीफ मक्के का कुल उत्पादन 23.21 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जो शुरुआती अनुमानों से 16.75% कम है। यह गिरावट मुख्य रूप से कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे प्रमुख राज्यों में सूखे और खराब मौसम की वजह से आई है।\n\n### पोल्ट्री सेक्टर पर असर (Impact on Poultry)\n\nनिवेशकों के लिए चिंता की बात यह है कि पोल्ट्री बिजनेस में कुल उत्पादन लागत का लगभग 70% हिस्सा फीड (चारे) पर खर्च होता है, जिसमें मक्का सबसे मुख्य ऊर्जा स्रोत है। जब मक्के की सप्लाई घटती है और दाम बढ़ते हैं, तो सीधे तौर पर कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन (Operating Margin) पर दबाव आता है। अगर ये कंपनियां बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों पर नहीं डाल पाईं, तो आने वाली तिमाहियों में इनके मुनाफे में बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है।\n\n### सप्लाई चेन का जोखिम\n\nदिक्कत इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि नुकसान का बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा राज्यों से है। कर्नाटक में उत्पादन 33% से ज्यादा गिरा है, जबकि महाराष्ट्र में यह आंकड़ा करीब 24% है। इस रीजनल कंसंट्रेशन के कारण सप्लाई चेन में दिक्कतें आ रही हैं, जिससे फीड सामग्री जुटाना महंगा और चुनौतीपूर्ण हो गया है।\n\n### सोयाबीन की स्थिति भी नाजुक\n\nस्थिति को और गंभीर बना रहा है सोयाबीन का उत्पादन, जो पोल्ट्री फीड के लिए प्रोटीन का एक जरूरी सोर्स है। नेशनल सोयाबीन प्रोडक्शन में 3.52% की कमी के साथ यह 12.41 मिलियन टन तक सिमटने का अनुमान है। हालांकि मध्य प्रदेश और राजस्थान ने स्थिति को संभालने की कोशिश की है, लेकिन कुल सप्लाई आउटलुक अभी भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।\n\nनिवेशकों को सलाह है कि वे आगामी तिमाही नतीजों में कंपनियों के ऑपरेटिंग प्रॉफिट मार्जिन और इन्वेंट्री मैनेजमेंट पर बारीक नजर रखें।
