महाराष्ट्र के **265** तालुकों में सूखा घोषित कर दिया गया है। राज्य में मानसून की बारिश में **18%** की कमी के कारण तुअर और सोयाबीन की सप्लाई पर असर पड़ने की आशंका है, जिससे फूड इन्फ्लेशन और एग्री-बिजनेस कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।
महाराष्ट्र में मानसून की बेरुखी का असर अब साफ दिखने लगा है। राज्य में 18% बारिश की कमी के कारण 265 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है। स्थिति मराठवाड़ा और विदर्भ क्षेत्रों में सबसे चिंताजनक है, जहां बारिश की कमी क्रमशः 38% और 27% दर्ज की गई है। फिलहाल केंद्र सरकार की टीमें फसल के नुकसान का जायजा ले रही हैं।
बाजार पर असर: तुअर और सोयाबीन का गणित
निवेशकों के लिए चिंता की बड़ी वजह तुअर और सोयाबीन की सप्लाई है। महाराष्ट्र देश के कुल तुअर उत्पादन में 40% और सोयाबीन की सप्लाई में लगभग 50% योगदान देता है। उत्पादन में किसी भी बड़ी गिरावट का सीधा मतलब है बाजार में कम सप्लाई, जो रिटेल फूड प्राइसेस को और महंगा कर सकता है।
इन्फ्लेशन और कॉर्पोरेट मार्जिन पर असर
फूड इन्फ्लेशन रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के लिए एक अहम पैमाना है। यदि दालों और तिलहन की कीमतों में उछाल आता है, तो इसका असर कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) पर पड़ना तय है। पैकेज्ड फूड और एडिबल ऑयल कंपनियों के लिए कच्चा माल महंगा हो सकता है, जिससे उनके नेट प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव देखने को मिल सकता है। हालांकि, मध्य प्रदेश (जो 35% सोयाबीन का उत्पादन करता है) से राहत की उम्मीद है, लेकिन ट्रेडर्स की नजरें महाराष्ट्र की पैदावार पर टिकी हैं।
रबी सीजन पर मंडराता खतरा
चिंता केवल खरीफ फसल तक सीमित नहीं है। बारिश की कमी से मिट्टी में नमी (Soil Moisture) काफी कम है, जो रबी सीजन में चने की बुवाई के लिए बड़ा जोखिम है। महाराष्ट्र चने के उत्पादन में भी लीडर है, ऐसे में अगर नमी नहीं सुधरी तो बुवाई का रकबा घट सकता है। निवेशकों को अब सरकार की प्रोक्योरमेंट रिपोर्ट पर नजर रखनी चाहिए, जो इस सप्लाई संकट की गंभीरता को साफ कर देगी।
