मटेरियल रीसाइक्लिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया (MRAI) ने सरकार से एल्युमीनियम स्क्रैप के आयात पर लगने वाली **2.5%** कस्टम ड्यूटी को खत्म करने की अपील की है। इस कदम से उन घरेलू रीसाइक्लर की लागत कम होगी जो कच्चे माल के लिए **80-85%** आयात पर निर्भर हैं।
आखिर क्यों हटाई जाए ड्यूटी?
MRAI का कहना है कि यह ड्यूटी घरेलू निर्माताओं और रीसाइक्लर पर भारी पड़ रही है, जिससे उनकी इनपुट कॉस्ट अंतरराष्ट्रीय प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में काफी बढ़ जाती है।
भारत की आयात पर निर्भरता
भारत अपनी एल्युमीनियम स्क्रैप की जरूरत का करीब 80-85% हिस्सा विदेशों से ही पूरा करता है। यह निर्भरता सेकेंडरी एल्युमीनियम इंडस्ट्री के लिए कच्चे माल की लागत को बेहद अहम बना देती है। इस इंडस्ट्री में बॉक्साइट अयस्क से एल्युमीनियम बनाने के बजाय स्क्रैप को पिघलाकर इस्तेमाल लायक धातु तैयार की जाती है। इंडस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, सेकेंडरी एल्युमीनियम का उत्पादन FY16 में 0.85 मिलियन टन से बढ़कर FY26 तक अनुमानित 2.2 मिलियन टन तक पहुंचने की उम्मीद है, जो भारत की कुल एल्युमीनियम खपत का लगभग 35% है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहे भारतीय MSME
रीसाइक्लिंग सेक्टर के प्रतिनिधियों का कहना है कि कॉपर, लेड और जिंक स्क्रैप पर जहां भारत में पहले से ही ड्यूटी-फ्री स्टेटस है, वहीं एल्युमीनियम पर 2.5% की लेवी अभी भी लागू है। MRAI के प्रेसिडेंट संजय मेहता ने बताया कि इससे भारतीय MSME, जापान, साउथ कोरिया, थाईलैंड, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों के निर्माताओं की तुलना में नुकसान में हैं, क्योंकि वहां ऐसी कोई इंपोर्ट ड्यूटी नहीं है। MRAI का मानना है कि इस बाधा को दूर करने से घरेलू मैन्युफैक्चरिंग की ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ेगी और सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा मिलेगा।
रोजगार पर भी असर
सेकेंडरी एल्युमीनियम सेक्टर करीब सात लाख लोगों को रोजगार देता है। ड्यूटी हटने से छोटे उद्योगों को बेहतर मार्जिन मिलेगा, जिससे वे अपने ऑपरेशन्स बढ़ा सकेंगे और प्रोसेसिंग को और बेहतर बना सकेंगे।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
निवेशकों के लिए, इस ड्यूटी को हटाने से बिजनेस मॉडल के आधार पर मिले-जुले असर हो सकते हैं। जिन सेकेंडरी एल्युमीनियम रीसाइक्लर और डाउनस्ट्रीम मैन्युफैक्चरर्स का आयातित स्क्रैप पर ज्यादा भरोसा है, उन्हें ड्यूटी खत्म होने पर बेहतर प्रॉफिट मार्जिन मिल सकता है, क्योंकि उनकी रॉ मटेरियल की लागत सीधे कम हो जाएगी। वहीं, प्राइमरी एल्युमीनियम प्रोड्यूसर्स, जो घरेलू बॉक्साइट माइनिंग और रिफाइनिंग पर निर्भर करते हैं, उनकी कॉस्ट स्ट्रक्चर अलग होती है। आयातित स्क्रैप के सस्ता होने से डोमेस्टिक मार्केट में एल्युमीनियम प्रोडक्ट्स की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।
आगे क्या?
इंडस्ट्री के लिए सबसे अहम बात यह है कि सरकार इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाती है। निवेशक और मार्केट पार्टिसिपेंट्स बजट घोषणाओं या फाइनेंस मिनिस्ट्री की आधिकारिक सूचनाओं पर नजर रखेंगे कि ड्यूटी में कोई बदलाव होता है या नहीं। इसके अलावा, ग्लोबल एल्युमीनियम स्क्रैप की कीमतों में आने वाले रुझान और सेकेंडरी प्रोड्यूसर्स की कैपेसिटी यूटिलाइजेशन रेट्स भी सेक्टर के फाइनेंशियल परफॉर्मेंस को प्रभावित करते रहेंगे।
