केरल के मछुआरे झींगा पकड़ने वाली नावों पर टर्टल-एक्सक्लूडर डिवाइस (TEDs) लगाने के अनिवार्य नियम का विरोध कर रहे हैं। उनका दावा है कि इससे मछली पकड़ने की क्षमता में **8-10%** तक की गिरावट आएगी, जो सीधे तौर पर एक्सपोर्ट बिजनेस को प्रभावित करेगा।
नियम से क्यों नाराज हैं मछुआरे?
फेडरेशन ऑफ फिशिंग बोट्स एंड फिशरी इंडस्ट्रीज ऑफ केरल ने इस अनिवार्य उपकरण के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। मछुआरों का कहना है कि टर्टल-एक्सक्लूडर डिवाइस (TEDs) लगाने से न केवल नावों को अपग्रेड करने का खर्च बढ़ेगा, बल्कि कुल कैच में 8% से 10% की कमी आएगी। साथ ही, वे इस बात से भी नाराज हैं कि नियम सिर्फ ट्रॉलर्स पर थोपा जा रहा है, जबकि गिलनेट्स (gillnets) जैसे अन्य साधनों को छूट दी गई है।
अमेरिका के नियम और भारत की चुनौती
भारत से होने वाले झींगा निर्यात में अमेरिका एक बड़ा बाजार है। अमेरिकी कड़े आयात मानकों के चलते भारतीय निर्यातकों पर TEDs लगाने का दबाव है। हालांकि, इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि सिर्फ इन उपकरणों को लगाने से अमेरिकी बाजार में लंबे समय तक पकड़ बनी रहेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है।
'भारत ब्रांडिंग' का नया विकल्प
इस संकट को सुलझाने के लिए मछुआरे अब एक स्वदेशी 'भारत ब्रांडिंग' सर्टिफिकेशन सिस्टम का प्रस्ताव लेकर आए हैं। इसके लिए वे सेंट्रल मरीन फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट (CMFRI), सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फिशरीज टेक्नोलॉजी (CIFT) और मरीन प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (MPEDA) की तकनीकी विशेषज्ञता का उपयोग करना चाहते हैं। उनका तर्क है कि केरल के समुद्री तटों पर कछुओं के लिए खतरा न्यूनतम है, इसलिए विदेश से थोपे गए इन अनिवार्य उपकरणों के बजाय भारतीय शोध पर आधारित प्रमाणन प्रणाली अधिक कारगर साबित होगी।
