ईरान युद्ध से कच्चा तेल हुआ बेकाबू! | कीमतें ₹110 के पार, वैश्विक सप्लाई पर बड़ा संकट

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
ईरान युद्ध से कच्चा तेल हुआ बेकाबू! | कीमतें ₹110 के पार, वैश्विक सप्लाई पर बड़ा संकट
Overview

ईरान में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tension) का असर अब सीधे आपके बटुए पर दिखने लगा है। कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में आज भूचाल आ गया है और ये **$110** प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। यह पिछले कुछ सालों की सबसे तेज एक-दिवसीय बढ़त है, जो 2022 के रिकॉर्ड स्तरों के करीब पहुंच गई है।

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क्यों मचाया तेल की कीमतों ने हाहाकार?

इस तूफानी तेजी की मुख्य वजह है होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का बंद होना। इस बेहद अहम रास्ते से दुनिया का करीब 20% कच्चा तेल गुजरता है। इसी के साथ, मध्य पूर्व के प्रमुख तेल उत्पादक देश जैसे इराक (Iraq) और कुवैत (Kuwait) द्वारा प्रोडक्शन में कटौती की घोषणा ने सप्लाई की कमी को और बढ़ा दिया है। इन सब वजहों से वैश्विक एनर्जी सप्लाई चेन (energy supply chain) की कमजोरियां साफ दिख रही हैं।

मार्केट में मची खलबली

खबरों के मुताबिक, ब्रेंट क्रूड (Brent crude) फ्यूचर्स $116.18 प्रति बैरल तक पहुंच गया है, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) $116.11 के आसपास कारोबार कर रहा है। यह 2020 के बाद की सबसे बड़ी एक-दिवसीय बढ़त है, जो 20% से अधिक है। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से फारस की खाड़ी (Persian Gulf) के तेल उत्पादकों के लिए अपनी सप्लाई को दुनिया भर के बाजारों तक पहुंचाना मुश्किल हो गया है। सऊदी अरब (Saudi Arabia) और UAE (United Arab Emirates) के पास वैकल्पिक पाइपलाइनें हैं, लेकिन वे भी प्रतिदिन 50-70 लाख बैरल की कमी को पूरी तरह से पूरा नहीं कर सकतीं, जबकि यहां से रोजाना 2 करोड़ बैरल तेल गुजरता है।

तेल उत्पादकों पर असर

सप्लाई में रुकावट और स्टोरेज (storage) की दिक्कतों के चलते, इराक के दक्षिणी तेल उत्पादन में 70% की गिरावट आई है, जो अब केवल 13 लाख बैरल प्रतिदिन (bpd) रह गया है। कुवैत ने अपने निर्यात पर 'फोर्स मेजर' (force majeure) घोषित कर दिया है, यानी वे अपने अनुबंधित सप्लाई को पूरा करने की स्थिति में नहीं हैं। UAE भी अपने ऑफशोर प्रोडक्शन (offshore production) को मैनेज कर रहा है। कतर (Qatar) ने तो लिक्विड नेचुरल गैस (LNG) के निर्यात पर भी रोक लगा दी है। एनालिस्ट्स (Analysts) का कहना है कि सऊदी अरब और UAE में स्टोरेज क्षमता तेजी से भर रही है, जिससे और प्रोडक्शन कट की नौबत आ सकती है।

एशिया और अफ्रीका पर सबसे ज्यादा मार

एशियाई देशों पर इस एनर्जी शॉक (energy shock) का सबसे बुरा असर पड़ने की आशंका है। ये देश भारी मात्रा में मध्य पूर्व से तेल आयात करते हैं। थाईलैंड (Thailand), साउथ कोरिया (South Korea), जापान (Japan) और फिलीपींस (Philippines) जैसे देश सबसे ज्यादा चपेट में आ सकते हैं। जापान और फिलीपींस तो 95% तक तेल के लिए इन देशों पर निर्भर हैं। साउथ कोरिया का शेयर बाजार कोस्पी (Kospi) पहले ही 20% गिर चुका है। दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक चीन (China) के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर (manufacturing sector) के लिए लागत बढ़ेगी। यूरोप (Europe) भी इसी तरह के दबाव का सामना कर रहा है, जहां पहले से ही एनर्जी की कीमतों से महंगाई बढ़ रही है।

दूसरी ओर, नाइजीरिया (Nigeria) जैसे तेल निर्यातक देशों को भले ही कमाई का मौका मिले, लेकिन वहां के आम नागरिकों को महंगी कीमतों का सामना करना पड़ेगा। अफ्रीका (Africa) की कई कमजोर अर्थव्यवस्थाएं, जो पहले से ही IMF (International Monetary Fund) की मदद पर चल रही हैं, पर यह संकट और गहराएगा क्योंकि एनर्जी आयात का बिल उनके विदेशी मुद्रा भंडार (foreign exchange reserves) को खत्म कर देगा। सूडान (Sudan), द गाम्बिया (The Gambia), सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक (Central African Republic), लेसोथो (Lesotho) और जिम्बाब्वे (Zimbabwe) जैसे देश विशेष रूप से जोखिम में हैं।

आगे क्या? | बड़े खतरों की आहट

हालांकि G7 देशों के वित्त मंत्री इमरजेंसी ऑयल रिजर्व (emergency oil reserves) जारी करने पर चर्चा कर रहे हैं, लेकिन स्थिति अभी भी बहुत अनिश्चित बनी हुई है। गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) के एनालिस्ट्स का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के जोखिम के कारण $14 प्रति बैरल का अतिरिक्त प्रीमियम जुड़ गया है और अगर रुकावटें बनी रहीं तो कीमतें $100 प्रति बैरल के पार जा सकती हैं।

वहीं, जेपी मॉर्गन (J.P. Morgan) का अनुमान है कि 2026 तक ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत $60 प्रति बैरल के आसपास रहेगी, बशर्ते सप्लाई-डिमांड (supply-demand) के फंडामेंटल्स (fundamentals) मजबूत रहें। लेकिन, यह सब इस बात पर निर्भर करेगा कि यह संकट कब तक चलता है।

डॉयचे बैंक (Deutsche Bank) ने तो सबसे बुरे हालात में कच्चे तेल की कीमतें $200 प्रति बैरल तक पहुंचने की चेतावनी दी है। यह स्थिति वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंदी (stagflationary) की ओर धकेल सकती है। ईरान के सुप्रीम लीडर के उत्तराधिकारी का मामला भी बाजार में चिंता बढ़ा रहा है, क्योंकि इससे नीतिगत स्थिरता का संकेत मिलता है और तत्काल तनाव कम होने की उम्मीद कम है।

यह सब तब हो रहा है जब शिपिंग की लागत में भी बड़ा इजाफा हुआ है, जैसे कि यूरोपीय बेंचमार्क के लिए जेट फ्यूल (jet fuel) की कीमतों में 72% की बढ़ोतरी देखी गई है। ये सभी फैक्टर्स मिलकर वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा रहे हैं और महंगाई को और हवा दे रहे हैं।

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