भारत का ₹3.8 लाख करोड़ का सोना लॉकर में बंद! रीसाइक्लिंग से सुधर सकती है अर्थव्यवस्था

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AuthorMehul Desai|Published at:
भारत का ₹3.8 लाख करोड़ का सोना लॉकर में बंद! रीसाइक्लिंग से सुधर सकती है अर्थव्यवस्था

भारत के घरों और मंदिरों के लॉकर में करीब **32,000 टन** सोना पड़ा है, जिसकी कीमत लगभग **$3.8 ट्रिलियन** है। इस सोने की रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देने से देश का आयात पर निर्भरता काफी कम हो सकती है, लेकिन सांस्कृतिक वजहें और ग्रामीण इलाकों में सीमित इंफ्रास्ट्रक्चर इस राह में रोड़ा बने हुए हैं।

भारत का सोना: एक बड़ी छिपी हुई दौलत

भारत में सोने का भंडार बहुत बड़ा है, अनुमान है कि यह 30,000 से 32,000 टन के बीच है। यह दुनिया भर में सबसे बड़े निजी सोने के भंडारों में से एक है। फिलहाल इसकी कीमत लगभग $3.8 ट्रिलियन आंकी गई है। यह सोना ज्यादातर घरों और धार्मिक संस्थानों के लॉकर में बंद पड़ा है। यह परिवारों के लिए एक पारंपरिक सुरक्षा कवच तो है, लेकिन अर्थव्यवस्था के लिए इसका कोई खास फायदा नहीं हो रहा है।

सोने के आयात का आर्थिक बोझ

सोने का आयात (Import) भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दूसरा सबसे बड़ा बोझ है, तेल के बाद। साल 2025-26 के फाइनेंशियल ईयर में, कुल आयात बिल का 12.3% सिर्फ सोने पर खर्च हुआ। लगातार सोने का आयात करने से देश के करेंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बनता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर भारत अपने निजी और मंदिरों में रखे सोने का सिर्फ 1% भी सालाना रीसायकल कर पाए, तो राष्ट्रीय आयात की मांग 25% से 30% तक कम हो सकती है।

रीसाइक्लिंग की राह में चुनौतियां

हालांकि भारत दुनिया में सोने का दूसरा सबसे बड़ा कंज्यूमर है, लेकिन सोने की रीसाइक्लिंग का इंफ्रास्ट्रक्चर अभी पूरी तरह तैयार नहीं है। पिछले पांच सालों में, कुल वार्षिक सोने की सप्लाई का सिर्फ 11% ही रीसायकल हुआ है। इसमें से भी बड़ा हिस्सा अभी भी छोटे, असंगठित ज्वैलर्स के जरिए ही होता है, जहां सोने की शुद्धता (Purity) और वैल्यूएशन (Valuation) की जांच में पारदर्शिता की कमी है।

इस कमी को दूर करने के लिए, MMTC-PAMP जैसी प्राइवेट कंपनियां नई टेक्नोलॉजी ला रही हैं। इनमें जर्मन XRF टेस्टिंग टेक्नोलॉजी और सर्टिफाइड वजन मशीनें शामिल हैं। इनका मकसद गहनों को तोड़े बिना उनकी शुद्धता का सटीक पता लगाना है। इंडस्ट्री का लक्ष्य पुरानी, अपारदर्शी तरीकों से हटकर एक पारदर्शी, टेक-सेवी फ्रेमवर्क बनाना है, जिससे ग्राहकों का भरोसा बढ़े।

सांस्कृतिक और लॉजिस्टिक बाधाएं

टेक्नोलॉजी के अलावा, इस बदलाव के रास्ते में गहरी सांस्कृतिक जड़ें भी हैं। ज्यादातर भारतीय परिवारों के लिए सोना सिर्फ एक निवेश नहीं है; यह पारिवारिक विरासत, सम्मान का प्रतीक और इमरजेंसी फंड का काम करता है। ऐसे में, लोग पुरखों के गहनों को पिघलाने या बेचने से हिचकिचाते हैं। इसके अलावा, आधुनिक रीसाइक्लिंग सेंटर अभी बड़े शहरों तक ही सीमित हैं, जिससे छोटे शहरों में पड़े सोने को इस सिस्टम में लाना मुश्किल है।

निवेशकों और सरकार के लिए आगे का रास्ता यह है कि कलेक्शन सेंटरों का दायरा बढ़ाया जाए और ट्रांजैक्शन को डिजिटल बनाया जाए। इस बदलाव की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या नई, पारदर्शी व्यवस्थाएं सोने के प्रति भावनात्मक लगाव को दूर कर पाती हैं और सोने को जमा करके रखने के पुराने मॉडल का एक व्यवहार्य विकल्प पेश कर पाती हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.