भारत के स्टील सेक्टर ने कमाल कर दिया है! हालिया वित्त वर्ष 2025-26 में क्रूड स्टील का उत्पादन **41%** बढ़कर **170.15 मिलियन टन** पर पहुंच गया है। इन्फ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग की मजबूत डिमांड ने इसे सपोर्ट किया है। पिछले 5 सालों में फिनिश्ड स्टील की खपत **55%** बढ़ी है, जिससे इंपोर्ट पर हमारी निर्भरता घटी है। अब निवेशक **₹6,322 करोड़** की PLI स्कीम का इस्तेमाल करके कंपनियां कैसे हाई-वैल्यू वाले स्पेशियलिटी स्टील बनाएंगी, इस पर नजरें गड़ाए हुए हैं।
इन्फ्रास्ट्रक्चर डिमांड और इंपोर्ट ट्रेंड्स
पिछले पांच सालों में भारतीय स्टील इंडस्ट्री ने ज़बरदस्त ग्रोथ दिखाई है, जिसमें प्रोडक्शन और खपत के आंकड़े 2025-26 में नई ऊंचाइयों पर पहुंच गए हैं। हाल ही में खत्म हुए वित्त वर्ष में क्रूड स्टील का उत्पादन 170.15 मिलियन टन रहा, जबकि 2021-22 में यह 120.29 मिलियन टन था। यह 41% की ज़बरदस्त बढ़ोतरी है, जो सेक्टर की बढ़ी हुई कैपेसिटी और घरेलू मांग को पूरा करने की क्षमता को दर्शाता है।
फिनिश्ड स्टील की खपत इस अवधि में और भी तेजी से, यानी 55% बढ़ी है, जो 105.75 मिलियन टन से बढ़कर 164.36 मिलियन टन हो गई। मांग में आई यह तेजी सीधे तौर पर देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के विस्तार से जुड़ी है। स्टील मंत्रालय के मुताबिक, इंपोर्ट पर निर्भरता में भी कमी आई है। FY26 में फिनिश्ड स्टील की कुल खपत में इंपोर्ट का हिस्सा घटकर 3.97% रह गया, जो FY22 में 4.42% था। इसका मतलब है कि डोमेस्टिक प्रोड्यूसर्स मार्केट का बड़ा हिस्सा कैप्चर करने में कामयाब हो रहे हैं।
स्पेशियलिटी स्टील और PLI इन्वेस्टमेंट
हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स की ओर बढ़ने के लिए, सरकार प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम के जरिए स्पेशियलिटी स्टील के प्रोडक्शन को बढ़ावा दे रही है। ₹6,322 करोड़ के कुल बजट वाली इस पहल का मकसद एडवांस्ड स्टील ग्रेड्स के लिए डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग कैपेबिलिटी को बढ़ाना है। जून 2026 तक के एक्सचेंज डेटा और मिनिस्ट्री की रिपोर्ट्स बताती हैं कि पार्टिसिपेट करने वाली कंपनियों ने इन प्रोजेक्ट्स के लिए लगभग ₹26,320 करोड़ के कैपिटल स्पेंडिंग का कमिटमेंट किया है। यह इन्वेस्टमेंट बड़े प्रोड्यूसर्स की स्ट्रेटेजी में बदलाव को दिखाता है, जो सिर्फ कमोडिटी-ग्रेड स्टील के बजाय कॉम्प्लेक्स स्टील प्रोडक्ट्स पर फोकस करके मार्जिन बढ़ाना चाहते हैं।
रॉ मैटेरियल के रिस्क को मैनेज करना
प्रोडक्शन में पॉजिटिव ट्रेंड्स के बावजूद, सेक्टर को इंपोर्टेड कोकिंग कोल पर निर्भरता की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, जो ब्लास्ट फर्नेस ऑपरेशंस के लिए बहुत जरूरी है। भारत में हाई-क्वालिटी कोकिंग कोल के पर्याप्त घरेलू भंडार न होने के कारण, प्रोड्यूसर्स ग्लोबल कमोडिटी मार्केट की प्राइस वोलेटिलिटी और सप्लाई चेन में आने वाली बाधाओं के प्रति संवेदनशील बने हुए हैं। सरकार फिलहाल ऐसी टेक्नोलॉजीज को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है जो रॉ मैटेरियल इंटेंसिटी को कम करें और इस कॉस्ट प्रेशर को कम करने के लिए वैकल्पिक प्रक्रियाओं को बढ़ावा दें।
निवेशक PLI स्कीम द्वारा समर्थित नई स्पेशियलिटी स्टील कैपेसिटीज की कमीशनिंग टाइमलाइन्स पर नजर रख सकते हैं, क्योंकि ये मार्जिन इंप्रूवमेंट की संभावना तय करेंगी। इसके अलावा, कंपनियों की वोलेटाइल रॉ मैटेरियल कॉस्ट को मैनेज करने और हाई कैपेसिटी यूटिलाइजेशन बनाए रखने की क्षमता आने वाली तिमाहियों में इंडस्ट्री की प्रॉफिटेबिलिटी के लिए एक प्राइमरी फैक्टर बनी रहेगी।
