भारतीय शराब उद्योग पर विदेशी इंपोर्ट का साया? नई ट्रेड डील्स से कंपनियों की बढ़ी चिंता

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AuthorAditya Rao|Published at:
भारतीय शराब उद्योग पर विदेशी इंपोर्ट का साया? नई ट्रेड डील्स से कंपनियों की बढ़ी चिंता
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भारतीय अल्कोहलिक बेवरेज कंपनियों (CIABC) ने सरकार से 'लेवल प्लेइंग फील्ड' यानी बराबरी का मौका सुनिश्चित करने की मांग की है। अमेरिका, यूरोपीय संघ (EU) और यूके (UK) के साथ हुए नए ट्रेड एग्रीमेंट में शराब और अन्य मादक पेय पदार्थों पर इंपोर्ट ड्यूटी में भारी कटौती की गई है, जिससे विदेशी शराब की एंट्री आसान हो गई है।

नई दिल्ली: भारत के शराब उद्योग के लिए चिंताजनक खबर है। कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन अल्कोहलिक बेवरेज कंपनीज (CIABC) ने सरकार से मांग की है कि देश के शराब निर्माताओं के लिए 'लेवल प्लेइंग फील्ड' यानी बराबरी का मौका सुनिश्चित किया जाए। अमेरिका, यूरोपीय संघ (EU) और यूके (UK) जैसे देशों के साथ हुए नए व्यापारिक समझौतों में शराब और अन्य मादक पेय पदार्थों पर इंपोर्ट ड्यूटी में भारी कटौती की गई है।

इंपोर्ट ड्यूटी में कटौती का दौर

समझौतों के तहत, अमेरिका से आने वाली वाइन और स्पिरिट्स पर इंपोर्ट ड्यूटी कम या खत्म की जाएगी। वहीं, EU के साथ हुए समझौते में प्रीमियम वाइन पर ड्यूटी 150% से घटकर 20% तक, स्पिरिट्स पर 150% से 40% तक और बीयर पर 110% से 50% तक की जाएगी। भारत-यूके फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) के तहत स्कॉच व्हिस्की पर ड्यूटी 10 साल में 75% से घटकर 40% हो जाएगी। पिछले साल ही, फरवरी 2025 में, भारत ने बोरबॉन व्हिस्की पर इंपोर्ट ड्यूटी 150% से घटाकर 100% कर दी थी।

घरेलू निर्माताओं की चिंताएं

CIABC का कहना है कि भारतीय शराब निर्माता पहले से ही कई मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। घरेलू कंपनियों के लिए कैपिटल और ऑपरेशनल खर्चे ज्यादा हैं, और अलग-अलग राज्यों में लाइसेंसिंग प्रक्रिया भी काफी पेचीदा है। इसके अलावा, इंपोर्टेड बॉटल्ड-इन-ऑरिजिन (BIO) स्पिरिट्स को कुछ भारतीय राज्यों में टैक्स के मामले में फायदा मिलता है, जिससे लोकल ब्रांड्स की कॉम्पिटिशन में टिकना मुश्किल हो जाता है। इंपोर्ट ड्यूटी कम होने से इन स्ट्रक्चरल दिक्कतों का असर और भी बढ़ जाएगा, जिसे कंपनियां 'डबल व्हैमी' बता रही हैं।

कंपनियों पर असर और मार्केट का हाल

इस स्थिति में, प्रमुख कंपनियां जैसे Sula Vineyards (मार्केट कैप: लगभग ₹1,589 करोड़, P/E: लगभग 51.0) और Radico Khaitan (मार्केट कैप: लगभग ₹36,515 करोड़, P/E: लगभग 89.6) के लिए चुनौती बढ़ सकती है। इन कंपनियों के मौजूदा हाई P/E रेश्यो बताते हैं कि निवेशक भविष्य में अच्छी ग्रोथ की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन अगर घरेलू मसलों को ट्रेड लिबरलाइजेशन के साथ हल नहीं किया गया तो यह ग्रोथ खतरे में पड़ सकती है। भारत का मार्केट साइज़ बड़ा है और इसमें प्रीमियम सेगमेंट की ग्रोथ अच्छी है, लेकिन राज्यों की एक्साइज पॉलिसी और रेगुलेटरी बदलाव कंपनियों के लिए मुश्किलें पैदा करते हैं।

आगे का रास्ता: प्रीमियमाइजेशन और बदलाव

इसके बावजूद, भारतीय अल्कोहलिक बेवरेज मार्केट में एक युवा आबादी और प्रीमियम सेगमेंट की बढ़ती मांग के चलते अच्छी ग्रोथ की उम्मीद है। हालांकि, प्रीमियमाइजेशन का यही ट्रेंड विदेशी कंपनियों के लिए भी बड़े अवसर लाएगा। भारतीय कंपनियों को टिकाऊ बने रहने और आगे बढ़ने के लिए क्वालिटी, ब्रांड वैल्यू और सप्लाई चेन एफिशिएंसी पर ध्यान देना होगा, न कि केवल ड्यूटी प्रोटेक्शन पर। CIABC की तरफ से डंपिंग रोकने और भारतीय उत्पादों के लिए सही मार्केट एक्सेस सुनिश्चित करने की वकालत, ट्रेड एग्रीमेंट के साथ-साथ रेगुलेटरी सुधारों की अहमियत को भी दर्शाती है।

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