सोने-चांदी पर ड्यूटी में बड़ी बढ़ोतरी
सरकार ने सोने और चांदी पर लगने वाली इंपोर्ट ड्यूटी को 6% से बढ़ाकर 15% कर दिया है। यह नई दरें 13 मई से प्रभावी हो गई हैं। इस बढ़ोतरी में 10% का बेसिक कस्टम ड्यूटी और 5% का एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट सेस (AIDC) शामिल है।
सरकार का मानना है कि इससे सोने-चांदी का इम्पोर्ट कम होगा, डॉलर का बहिर्वाह (outflow) घटेगा और विदेशी मुद्रा भंडार (forex reserves) को सहारा मिलेगा, जिससे रुपये को मजबूती मिलेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सोने की खरीदारी कम करने की अपील के बाद यह कदम उठाया गया है। इस कदम के बाद, रुपया डॉलर के मुकाबले 95.61 पर कारोबार कर रहा था, जो हाल के 95.63 के निचले स्तर से थोड़ी रिकवरी है।
तेल की ऊंची कीमतें और भू-राजनीतिक जोखिम बन रहे हैं बड़ी चुनौती
हालांकि, रुपये में आई यह शुरुआती मजबूती वैश्विक आर्थिक दबावों के कारण चुनौतियों का सामना कर रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) 106 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है, और अनुमान है कि मई-जून तक कीमतें इसी स्तर पर बनी रह सकती हैं। अमेरिका-ईरान संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे प्रमुख तेल मार्ग की नाजुक स्थिति के कारण आपूर्ति बाधित होने की आशंका है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85% आयात करता है, इसलिए तेल की ऊंची कीमतें महंगाई को बढ़ावा दे सकती हैं, चालू खाता घाटा (Current Account Deficit - CAD) बढ़ा सकती हैं और आर्थिक विकास को धीमा कर सकती हैं। मूडीज रेटिंग्स (Moody's Ratings) ने हाल ही में बढ़ती ऊर्जा लागतों के कारण 2026 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ (GDP Growth) का अनुमान घटाकर 6% कर दिया है। इस साल की शुरुआत से अब तक, भारतीय रुपया एशिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में से एक रहा है, जो अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 5.6% गिर चुका है।
विशेषज्ञों की राय: यह कदम काफी नहीं
विशेषज्ञों का मानना है कि सोने के आयात पर ड्यूटी बढ़ाने का कदम तत्काल नकदी बहिर्वाह (outflow) को रोकने में मदद कर सकता है, लेकिन यह रुपये की मुख्य कमजोरियों को दूर नहीं करता। ऊर्जा आयात पर भारत की भारी निर्भरता और लगातार बना हुआ चालू खाता घाटा (CAD) प्रमुख चिंताएं हैं। दिसंबर 2025 तिमाही में CAD सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 1.3% था और नए वित्तीय वर्ष के लिए भी यह लगभग 1.3% रहने का अनुमान है।
1 मई तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) 690.69 अरब डॉलर था, हालांकि यह एक महीने के निचले स्तर पर आ गया है, जो 1 मई को समाप्त सप्ताह में 7.7 अरब डॉलर घट गया। वर्तमान में, यह भंडार लगभग 10 से 11 महीनों के आयात को कवर करने के लिए पर्याप्त है। ANZ के विश्लेषकों का कहना है कि 'बाहरी फंडिंग की संरचनात्मक रूप से कमजोर स्थितियां' बनी हुई हैं, जिसका मतलब है कि CAD में छोटी सी वृद्धि भी रुपये और भंडार पर दबाव डाल सकती है। यदि भू-राजनीतिक संघर्ष बढ़ता है, तेल की कीमतों में लगातार झटके लगते हैं और पूंजी का बहिर्वाह (capital outflow) जारी रहता है, तो ड्यूटी में यह वर्तमान वृद्धि पर्याप्त नहीं हो सकती है। कुछ विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं या भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो USD/INR 96-97 या 100 के स्तर तक भी जा सकता है।
आगे का रास्ता और RBI की भूमिका
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) विदेशी मुद्रा बाजार में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप कर रहा है ताकि अस्थिरता को नियंत्रित किया जा सके। RBI ने डॉलर के मुकाबले अपनी शॉर्ट पोजीशन को रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया है। विश्लेषकों को उम्मीद है कि 2026 के अंत तक USD/INR 95 से 97 के बीच कारोबार करेगा, जो तेल की कीमतों और पूंजी प्रवाह पर निर्भर करेगा। अप्रैल में भारत की महंगाई दर 3.48% थी, जो RBI के लक्ष्य से नीचे है। हालांकि, वैश्विक ऊर्जा लागतों में वृद्धि महंगाई के लिए एक ऊपर की ओर जोखिम (upside risk) पेश करती है। भारत की घरेलू नीतियों की सफलता अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता और देश के व्यापार व वित्त पर इसके प्रभाव के खिलाफ परखी जाएगी।
