भारत में क्यों बढ़ रही हैं चावल की कीमतें?
भारत के निर्यातकों (Exporters) का कहना है कि चावल की कीमतें बढ़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण भारतीय रुपये का मजबूत होना और ग्लोबल मांग में आई हल्की बढ़ोतरी है। दरअसल, जब रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत होता है, तो निर्यातकों को डॉलर में कमाई का कम रुपया मिलता है। ऐसे में, अपने मुनाफे (Profit) को बनाए रखने के लिए उन्हें डॉलर-आधारित कीमतें बढ़ानी पड़ती हैं। भारत में 5% ब्रोकन परबॉइल्ड चावल की कीमत $344-$350 प्रति मीट्रिक टन है, वहीं 5% ब्रोकन व्हाइट राइस $338-$344 प्रति टन पर ट्रेड कर रहा है।
दक्षिण-पूर्व एशिया में बढ़ी लागत, जानिए कारण
वहीं, दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रमुख चावल उत्पादक देशों जैसे वियतनाम और थाईलैंड के लिए स्थिति अलग है। वियतनाम में 5% ब्रोकन राइस की कीमत $375-$380 प्रति मीट्रिक टन पर स्थिर है, लेकिन थाईलैंड के चावल की कीमतों में बड़ा उछाल आया है। थाईलैंड में कीमतें $410-$440 प्रति टन तक पहुंच गई हैं। इसके पीछे का मुख्य कारण मध्य पूर्व (Middle East) में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions) है। इस संघर्ष के कारण शिपिंग, फ्यूल और फर्टिलाइजर जैसी जरूरी चीजों की लागत तेजी से बढ़ी है, जिसका सीधा असर उत्पादन और निर्यात पर पड़ रहा है। इसके अलावा, थाई बाथ (Thai Baht) के मजबूत होने से थाई चावल अन्य देशों के मुकाबले करीब $50 प्रति टन महंगा हो गया है। हालांकि, इन सबके बावजूद खरीदार अभी बहुत सक्रिय नहीं दिख रहे हैं।
FAO इंडेक्स में गिरावट, पर क्या है पूरा सच?
दिलचस्प बात यह है कि इन अलग-अलग रुझानों के बीच, मार्च महीने में FAO ऑल राइस प्राइस इंडेक्स में 3.0% की गिरावट दर्ज की गई। यह गिरावट मुख्य रूप से कटाई के मौसम, मध्य पूर्व के युद्धग्रस्त देशों से आयात मांग में कमी और एशिया के प्रमुख निर्यातकों की करेंसी में आई कमजोरी के कारण देखी गई। यह दर्शाता है कि जहां कुछ देशों में भू-राजनीतिक घटनाओं और करेंसी के उतार-चढ़ाव से कीमतें बढ़ रही हैं, वहीं वैश्विक स्तर पर आयात मांग में कमी और अन्य मुद्राओं के कमजोर होने से कीमतों पर नीचे की ओर दबाव भी है।
सप्लाई चेन पर भू-राजनीतिक जोखिम
मध्य पूर्व में जारी संघर्ष का असर सप्लाई चेन पर भी दिख रहा है। खासकर, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में संभावित बाधाओं से ऊर्जा और फ्यूल की लागत बढ़ रही है, जो खेती के लिए जरूरी फर्टिलाइजर की कीमतों को भी बढ़ा रही है। इन बढ़ी हुई इनपुट लागतों से किसानों का मुनाफा घट रहा है, जिससे बुआई में कमी और फसल उत्पादन में गिरावट की चिंताएं बढ़ गई हैं।
भविष्य की राह
आगामी फाइनेंशियल ईयर 2025/26 के लिए वैश्विक चावल उत्पादन स्थिर रहने या थोड़ा बढ़ने की उम्मीद है, जबकि खपत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकती है। हालांकि, ट्रेड वॉल्यूम (Trade Volumes) 61.1-62.8 मिलियन टन के बीच रहने का अनुमान है। ऐसे में, भारत जैसे प्रमुख निर्यातकों की ऊंची कीमतें और संघर्ष वाले क्षेत्रों से कम आयात मांग ट्रेड को प्रभावित कर सकती है। भारत के शीर्ष निर्यातक बने रहने की उम्मीद है, लेकिन पाकिस्तान जैसे देशों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। बाजार की अगली दिशा निर्यातकों के बीच प्रतिस्पर्धा, अफ्रीका और मध्य पूर्व जैसे क्षेत्रों से बदलती मांग और भू-राजनीतिक घटनाओं व करेंसी बाजारों के प्रभाव पर निर्भर करेगी।