पॉलिसी के अनिश्चित माहौल में रिफाइनरों की हिचकिचाहट
यह पूरा मामला अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक अहम फैसले के बाद पैदा हुई असमंजस की स्थिति का नतीजा है। इस फैसले ने भारत और रूस के बीच एक खास व्यापार सौदे को लेकर अनिश्चितता पैदा कर दी है, जिससे भारतीय रिफाइनर फिलहाल रूसी क्रूड की कोई भी नई बुकिंग नहीं कर रहे हैं। वे सरकार से इस बारे में स्पष्ट दिशानिर्देश का इंतजार कर रहे हैं कि आगे क्या करना है। वहीं, रूस का कहना है कि उन्हें भारत की ओर से तेल खरीद रोकने को लेकर कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है। इस बीच, Urals ग्रेड क्रूड पर $15-$20 प्रति बैरल का डिस्काउंट बढ़ गया है, जो बताता है कि बाजार में रूसी तेल की उपलब्धता बढ़ रही है और भारत जैसे खरीदार पीछे हट रहे हैं।
अलग-अलग मांग: चीन ने बढ़ाई खरीदारी, यूरोप ने घटाई
जहां भारतीय रिफाइनर सावधानी बरत रहे हैं, वहीं चीन ने रूसी क्रूड ऑयल का आयात काफी बढ़ा दिया है। फरवरी के पहले 18 दिनों में, चीनी बंदरगाहों पर औसतन 2.09 मिलियन बैरल प्रति दिन रूसी क्रूड आया, जो जनवरी और दिसंबर की तुलना में काफी अधिक है। इस तरह चीन भारत द्वारा कम की जा रही आपूर्ति को खपा रहा है। इसके विपरीत, यूरोपीय संघ (EU) ने रूसी ऊर्जा पर अपनी निर्भरता काफी कम कर दी है। 2021 की पहली तिमाही में जहां रूसी तेल EU के कुल आयात का 29% था, वहीं 2025 की तीसरी तिमाही तक यह घटकर सिर्फ 1% रह गया है। अब नॉर्वे और अमेरिका यूरोपीय संघ के प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन गए हैं।
मध्य पूर्व सप्लाई के बढ़ते जोखिम
जब भारतीय रिफाइनर अपनी आपूर्ति का विविधीकरण (Diversification) कर रहे हैं, तो उनका ध्यान मध्य पूर्व के उत्पादकों पर जा रहा है। इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) और भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (BPCL) जैसी कंपनियां अप्रैल और मई में डिलीवरी के लिए इस क्षेत्र से तेल खरीदने की टेंडर (Tender) पर काम कर रही हैं। लेकिन, भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है, इस बदलाव से आपूर्ति के बढ़ते जोखिमों के संपर्क में आ सकता है। खासकर ईरान के साथ अमेरिका के बढ़ते तनाव और क्षेत्र में अमेरिकी सेना की बढ़ी हुई मौजूदगी, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण शिपिंग मार्गों में संभावित व्यवधानों को लेकर चिंता बढ़ाती है। यह जलडमरूमध्य वैश्विक तेल खपत का लगभग 20% हिस्सा संभालता है। ऐसा कोई भी संघर्ष वैश्विक बाजारों को प्रभावित कर सकता है और भारत की ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है।
मजबूत फंडामेंटल, अनिश्चितता का दबाव
हालांकि तत्काल परिचालन चुनौतियां बनी हुई हैं, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन और भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन जैसे प्रमुख भारतीय रिफाइनरों के फंडामेंटल (Fundamentals) काफी मजबूत दिखते हैं। फरवरी 2026 तक, IOC लगभग 6.7x और BPCL लगभग 6.5x-7.4x के कम P/E रेशियो (P/E Ratio) पर ट्रेड कर रहे हैं। ये वैल्यू स्टॉक (Value Stocks) का संकेत देते हैं। IOC का मार्केट कैप (Market Cap) लगभग ₹2.54 ट्रिलियन और BPCL का लगभग ₹1.65 ट्रिलियन है। विश्लेषकों (Analysts) का इन दोनों कंपनियों के लिए आम तौर पर 'Buy' या 'Outperform' की सलाह है, जो उनके दीर्घकालिक प्रदर्शन पर विश्वास दिखाता है।
संभावित जोखिम: भू-राजनीतिक और आपूर्ति श्रृंखला की चिंताएं
रूसी क्रूड से दूरी बनाने का रणनीतिक कदम, अमेरिकी दबाव और जटिल व्यापार वार्ताओं के कारण, भारतीय रिफाइनरों को भू-राजनीतिक और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) के महत्वपूर्ण जोखिमों के सामने ला खड़ा करता है। सबसे बड़ी चिंता मध्य पूर्व के तेल पर बढ़ती निर्भरता है, जो विशेष रूप से ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक तनावों के प्रति संवेदनशील है। इस क्षेत्र में कोई भी संघर्ष गंभीर आपूर्ति व्यवधान और कीमतों में भारी उछाल ला सकता है, जो 2026 और 2027 के लिए अनुमानित तेल की अधिक आपूर्ति (Global Oil Glut) की तस्वीर को बिगाड़ सकता है। क्रूड ऑयल की कमोडिटी प्रकृति को देखते हुए, कोई भी अस्थायी व्यवधान भी वैश्विक बाजारों में तेजी से फैल सकता है। इसके अलावा, रूसी क्रूड पर मिलने वाली छूट, भले ही कम हो रही हो, फिर भी एक महत्वपूर्ण लागत लाभ प्रदान करती थी। वैकल्पिक, संभावित रूप से कम स्थिर या अधिक महंगे स्रोतों पर निर्भरता रिफाइनरों के मार्जिन (Margins) को प्रभावित कर सकती है और भारत की विशाल आबादी के लिए ईंधन की सामर्थ्य को कम कर सकती है।
भविष्य का अनुमान
बाजार के अनुमानों के अनुसार, 2026 और 2027 में वैश्विक तेल की कीमतों में नरमी आने की उम्मीद है, जिसमें ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की औसत कीमत क्रमशः लगभग $58/bbl और $53/bbl रहने का अनुमान है। हालांकि, यह अनुमान काफी हद तक मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक स्थिरता और व्यापार विवादों के समाधान पर निर्भर करेगा। आने वाले महीनों में भारतीय रिफाइनरों द्वारा लिए गए निर्णय, वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य के बीच, उनके वित्तीय प्रदर्शन और भारत की समग्र ऊर्जा सुरक्षा रणनीति दोनों को आकार देने में महत्वपूर्ण होंगे।