मुनाफे को निगल रहा नुकसान!
सरकारी तेल कंपनियों (OMCs) जैसे कि इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (HPCL) की वित्तीय हालत इस समय बेहद नाजुक नजर आ रही है। इन कंपनियों को चालू फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में लगभग ₹1 लाख करोड़ का कम्बाइंड नुकसान होने का अनुमान है। यह आंकड़ा पिछले फाइनेंशियल ईयर के IOCL, BPCL और HPCL के कुल मुनाफे, जो लगभग ₹76,000 करोड़ था, को भी पार कर सकता है।
कंपनियां पेट्रोल और डीजल को पिछले 4 सालों से भी ज्यादा (अप्रैल 2022 से) स्थिर कीमतों पर बेच रही हैं, जबकि घरेलू एलपीजी में भी बहुत मामूली बदलाव हुए हैं। इस दौरान, कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है, जो अप्रैल में $113 प्रति बैरल के पार चला गया, जबकि पिछले साल यह औसत $70 पर था। इस वजह से, कंपनियां रोजाना करीब ₹1,000 से ₹1,200 करोड़ का घाटा झेल रही हैं।
सरकार पर बढ़ता दबाव
ऐसे में सरकार के लिए भी मुश्किल बढ़ गई है। मार्च के अंत में, सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर ₹10 प्रति लीटर की एक्साइज ड्यूटी घटाई थी, जिसका मकसद ग्राहकों को राहत देना था। लेकिन इस फैसले से सरकार के खजाने को हर महीने ₹14,000 करोड़ का चूना लग रहा है। यह राजस्व की कमी OMCs के नुकसान की भरपाई करने के सरकारी विकल्पों को और सीमित कर देती है।
आयात पर निर्भरता और भू-राजनीतिक जोखिम
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी आयात पर निर्भर है। कच्चे तेल की 88% और एलपीजी की 90% जरूरतें आयात की जाती हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और हॉरमुज जलडमरूमध्य जैसे प्रमुख तेल मार्गों पर अस्थिरता ने शिपिंग और बीमा लागतों को काफी बढ़ा दिया है, साथ ही भू-राजनीतिक जोखिम प्रीमियम को भी बढ़ाया है। इससे भारत की आयात लागत सीधे तौर पर बढ़ गई है।
स्टॉक मार्केट में हलचल
इन भारी नुकसानों के बावजूद, OMCs के शेयर की कीमतों में हालिया ट्रेडिंग में मजबूती दिखी है। IOCL लगभग ₹155 पर, BPCL ₹420 के करीब, और HPCL ₹270 पर कारोबार कर रहे हैं। निवेशकों को शायद भविष्य में कीमतों में बढ़ोतरी की उम्मीद है। हालांकि, इनकी मार्केट कैप - IOCL की ₹1.5 लाख करोड़, BPCL की ₹1.2 लाख करोड़, और HPCL की ₹0.8 लाख करोड़ - उनके संचालन के पैमाने और वर्तमान वित्तीय जोखिम को दर्शाती है।
प्राइवेट प्लेयर्स की बढ़त
रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) और नायरा एनर्जी जैसे प्राइवेट प्लेयर्स के विपरीत, जिनके पास मार्केट-कैप ₹20 लाख करोड़ से ज्यादा है, OMCs के पास कीमत तय करने की उतनी फ्लेक्सिबिलिटी नहीं है। RIL जैसी कंपनियां अपने इंटीग्रेटेड रिफाइनिंग और पेट्रोकेमिकल ऑपरेशन्स और मार्केट-ड्रिवन प्राइसिंग के कारण इन नुकसानों से बची हुई हैं।
आगे क्या?
आम चुनाव संपन्न हो चुके हैं, ऐसे में बाजार के जानकारों का मानना है कि सरकार जल्द ही OMCs पर वित्तीय दबाव को कम करने के लिए फ्यूल कीमतों की समीक्षा कर सकती है। एनालिस्ट्स को उम्मीद है कि कीमतों में बढ़ोतरी की जा सकती है, हालांकि इसकी मात्रा ग्लोबल ऑयल मार्केट की स्थिरता और घरेलू वित्तीय स्थिति पर निर्भर करेगी।
