भारत का मिनरल इम्पोर्ट बिल फाइनेंशियल ईयर 2026 में **₹10.12 लाख करोड़** पर पहुंच गया है। सरकार ने **720** से ज्यादा मिनरल ब्लॉक्स की नीलामी की है, लेकिन केवल **105** ही चालू हो पाए हैं। इस खाई को पाटने के लिए सरकार ने नए कानून पेश किए हैं।
भारत अपनी औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने के लिए विदेशों पर कितना निर्भर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि फाइनेंशियल ईयर 2026 में देश का मिनरल इम्पोर्ट बिल ₹10.12 लाख करोड़ पहुंच गया। कोयला, आयरन ओर और अन्य क्रिटिकल मिनरल्स की बढ़ती मांग घरेलू उत्पादन के मुकाबले काफी अधिक है, जिससे पावर, स्टील और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर ग्लोबल प्राइस वोलेटिलिटी के प्रति संवेदनशील हो गए हैं।
नीलामी से उत्पादन तक का सफर मुश्किल
सरकार ने साल 2015 से अब तक 720 से ज्यादा मिनरल ब्लॉक्स की नीलामी की है, लेकिन कागजों पर अलॉट होने के बावजूद हकीकत कुछ और है। वर्तमान में केवल 105 ब्लॉक्स ही ऑपरेशनल हैं, जो कुल नीलाम हुए ब्लॉक्स का महज 14% है। बड़ी संख्या में मिनरल ब्लॉक्स का काम अटका हुआ है, जिससे नेशनल सप्लाई चेन को कोई फायदा नहीं मिल पा रहा है।
नए कानून से बदलेगी तस्वीर?
प्रोजेक्ट्स की देरी और सिस्टम की बाधाओं को दूर करने के लिए सरकार ने Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Act, 2026 लागू किया है। इसके तहत Section 9D जोड़ा गया है, जो स्टेट लेवल पर लेवी (Levies) के लिए एक स्टैंडर्ड फ्रेमवर्क तैयार करता है। पहले अलग-अलग राज्यों के अलग नियमों के कारण कंपनियां बड़े निवेश से बचती थीं, लेकिन अब रेगुलेटरी लॉजिक को सेंट्रलाइज करने से माहौल सुधरने की उम्मीद है।
रेवेन्यू बनाम प्रोडक्टिविटी
एक तरफ जहां प्रोडक्शन सुस्त है, वहीं राज्यों की कमाई जबरदस्त रही है। FY15 से FY26 के बीच राज्यों ने इस सेक्टर से ₹7.67 लाख करोड़ का रेवेन्यू वसूला है। उदाहरण के लिए, ओडिशा ने 79 में से 35 ब्लॉक्स को चालू किया है, जबकि देश के अन्य हिस्सों में कई प्रोजेक्ट्स अभी भी एडमिनिस्ट्रेटिव बाधाओं में फंसे हैं। निवेशकों की नजर अब इस बात पर है कि इन पॉलिसी बदलावों के बाद कितनी तेजी से नए ब्लॉक्स कमीशनिंग फेज में पहुंचते हैं।
