भारत अपनी एनर्जी ट्रांजीशन (Energy Transition) और इंडस्ट्रियल ग्रोथ (Industrial Growth) को बढ़ाने के लिए क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई चेन को मजबूत करने में जुटा है। इसी कड़ी में, यह देश दुनिया भर में नए पार्टनरशिप की तलाश कर रहा है ताकि चीन पर अपनी निर्भरता कम की जा सके। हालाँकि, यह रणनीति जितनी सीधी दिखती है, हकीकत उससे कहीं ज़्यादा जटिल है। इसमें लंबा वक़्त लगने वाला डेवलपमेंट टाइमलाइन (Development Timeline) और मिनरल प्रोसेसिंग (Mineral Processing) में एक बड़ी टेक्नोलॉजी की कमी शामिल है।
भारत की यह कूटनीतिक कवायद, जिसमें ब्राजील, कनाडा, फ्रांस और नीदरलैंड जैसे देशों से हाथ मिलाया जा रहा है, ग्लोबल मिनरल सप्लाई चेन को फिर से संतुलित करने की कोशिशों का हिस्सा है। यह सेक्टर आज भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions) और चीन के मज़बूत मार्केट पोजीशन (Market Position) से बहुत ज़्यादा प्रभावित है। ग्लोबल माइनिंग इंडस्ट्री (Global Mining Industry) में हाल के दिनों में ज़बरदस्त तेज़ी देखने को मिली है। S&P/TSX Global Mining Index पिछले एक साल में 92.18% बढ़ा है, तो वहीं MSCI World Metals and Mining Index ने भी 2025 में शानदार रिटर्न दिया। इस तेज़ी की वजह क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी (Clean Energy Technology) के लिए ज़रूरी मटेरियल्स की बढ़ती मांग है। लेकिन, लिथियम (Lithium) जैसी कमोडिटीज़ (Commodities) की कीमतें अभी भी वोलेटाइल (Volatile) हैं। 10 फरवरी 2026 तक लिथियम कार्बोनेट फ्यूचर्स (Lithium Carbonate Futures) CNY 1,36,000 प्रति टन पर ट्रेड कर रहे थे, जो दिन में 0.37% ऊपर, महीने में 10.53% नीचे, लेकिन साल भर में 76.28% ज़्यादा थे। रेयर अर्थ एलिमेंट्स (Rare Earth Elements) की कीमतों में भी उतार-चढ़ाव है, जैसे नियोडिमियम ऑक्साइड (Neodymium Oxide) की कीमत हाल ही में 16.36% बढ़ी है, जो सप्लाई की चिंताओं को दिखाती है। इन कीमतों के उतार-चढ़ाव पर ट्रेड पॉलिसीज़ (Trade Policies) और बड़ी उत्पादक देशों की चालें असर डालती हैं।
क्रिटिकल मिनरल्स और प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी (Processing Technology) हासिल करने की भारत की रणनीति, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों के साथ मौजूदा एग्रीमेंट्स को और मज़बूत करती है। इससे उन जगहों से भी एक्सेस बढ़ेगा जहाँ पहले कम सोर्स थे, और यह चीन के दबदबे के सामने एक अहम कदम है। चीन दुनिया की लगभग 60% क्रिटिकल रॉ मटेरियल्स की रिफाइनिंग कैपेसिटी (Refining Capacity) कंट्रोल करता है और 90% से ज़्यादा रेयर अर्थ्स की प्रोसेसिंग में लीड करता है। ऑस्ट्रेलिया दुनिया का सबसे बड़ा लिथियम प्रोड्यूसर (Lithium Producer) है, जबकि कनाडा के पास माइनिंग इनोवेशन (Mining Innovation) और निवेशकों के लिए फ्रेंडली पॉलिसीज़ (Investor-Friendly Policies) हैं। कनाडा के माइनर्स को दर्शाने वाला S&P/TSX Global Mining Index काफी बढ़ा है। भारत के अपने माइनिंग सेक्टर में, Coal India (P/E 7.78) और NMDC (P/E 12.56) जैसी कंपनियाँ इंडस्ट्री एवरेज P/E 9.63 से नीचे ट्रेड कर रही हैं, जो डोमेस्टिक मार्केट में वैल्यू (Value) के मौके दिखाती हैं। लेकिन, ग्लोबल माइनिंग इंडस्ट्री का P/E ratio करीब 24.41 है, जो ग्रोथ के लिए मार्केट की ऊंची उम्मीदों को बताता है। दुनिया भर में नए माइन डेवेलपमेंट (Mine Development) का प्रोसेस बहुत लंबा होता है, डिस्कवरी से प्रोडक्शन तक औसतन 17.9 साल लगते हैं, और यह समय लगातार बढ़ रहा है। अमेरिका में यह प्रोसेस रेगुलेटरी और लिटिगेशन (Litigation) की रुकावटों के कारण औसतन 29 साल तक जा सकता है। यह भारत के नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (National Critical Mineral Mission) के एंबिशियस टाइमलाइन (Ambitious Timelines) से बिल्कुल अलग है, जिसका लक्ष्य डोमेस्टिक एक्सप्लोरेशन (Domestic Exploration) और ओवरसीज एसेट एक्विजिशन (Overseas Asset Acquisition) को तेज़ करना है।
भारत की इन कोशिशों के बावजूद, क्रिटिकल मिनरल सप्लाई हासिल करने का रास्ता चुनौतियों से भरा है। नए माइन की डेवलपमेंट में लगने वाला औसतन 18 साल का लंबा समय, कुछ जगहों पर एक्सप्लोरेशन, परमिटिंग और एनवायर्नमेंटल रिव्यू (Environmental Review) की वजह से इससे भी ज़्यादा हो जाता है। इसका मतलब है कि नए एग्रीमेंट्स के बावजूद, सप्लाई में असली बढ़ोतरी में सालों, या शायद दशक लग जाएंगे। इसके अलावा, भारत को मिनरल प्रोसेसिंग में एक बड़ा टेक्नोलॉजिकल गैप (Technological Gap) झेलना पड़ रहा है, जहाँ चीन का दबदबा 90% से ज़्यादा रेयर अर्थ प्रोसेसिंग पर है। बाहरी प्रोसेसिंग कैपेसिटी (Processing Capacity) पर यह निर्भरता सप्लाई चेन की असली सिक्योरिटी को कमज़ोर करती है। चीन के अलावा, नई पार्टनरशिप्स अपने साथ भू-राजनीतिक जोखिम (Geopolitical Risks) भी लाती हैं। रिसोर्स नेशनलिज़्म (Resource Nationalism) अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे इलाकों में एक बढ़ती चिंता है, जिससे सप्लाई चेन बाधित हो सकती है या मनमाफिक शर्तें नहीं मिल सकतीं। इंटरनेशनल एग्रीमेंट्स की असरदारता, खासकर कई पार्टनर्स के साथ, अलग-अलग राष्ट्रीय हितों और राजनीतिक अस्थिरता (Political Instabilities) की वजह से कम हो सकती है। मिसाल के तौर पर, ब्राजील एक अहम पार्टनर है, लेकिन उसके क्रिटिकल मिनरल सेक्टर में अपनी चुनौतियाँ हैं। ब्राजीलियन क्रिटिकल मिनरल्स लिमिटेड (ASX:BCM) का P/E ratio -9.2x (LTM) है और प्राइस-टू-बुक रेशियो (Price-to-Book Ratio) 104.1x है, जो पियर्स (Peers) की तुलना में हाई वैल्यूएशन (High Valuation) दिखाता है। वहीं, बड़ा प्लेयर Vale S.A. (VALE) का फॉरवर्ड P/E 7.73 है। इन नई सप्लाई चेंस की लॉन्ग-टर्म वायबिलिटी (Long-Term Viability) अभी पक्की नहीं है।
भारत का नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन, जिसमें बड़ा निवेश किया गया है, डोमेस्टिक एक्सप्लोरेशन, ओवरसीज एसेट एक्विजिशन और रीसाइक्लिंग (Recycling) क्षमताओं को बेहतर बनाकर इन चुनौतियों से निपटने का लक्ष्य रखता है। इस मिशन के तहत 2030-31 तक 1,200 से ज़्यादा डोमेस्टिक एक्सप्लोरेशन प्रोजेक्ट्स और 50 ओवरसीज माइनिंग एसेट्स (Mining Assets) हासिल करने का लक्ष्य है। इसके अलावा, बजट 2024-25 में 25 क्रिटिकल मिनरल्स को बेसिक कस्टम ड्यूटी (Basic Customs Duty) से छूट दी गई है, ताकि डोमेस्टिक प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग को बढ़ावा मिले। ये पहलें एक लंबी अवधि की प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं, लेकिन इनकी सफलता ग्लोबल रिसोर्स डेवेलपमेंट (Global Resource Development) और टेक्नोलॉजी एक्विजिशन (Technology Acquisition) की अपनी जटिलताओं पर काबू पाने पर निर्भर करेगी।