निवेशकों की बेरुखी से खनिज ऑक्शन पर संकट
भारत के क्रिटिकल और स्ट्रेटेजिक मिनरल ब्लॉक की नीलामी के 6वें चरण में बड़े पैमाने पर रद्दीकरण देखा गया है। 11 ब्लॉक ऐसे रहे जहाँ या तो पर्याप्त निवेशक नहीं आए या फिर ज़रूरी संख्या में योग्य बोली लगाने वाले (qualified bidders) नहीं मिले। यह भारत के लिए एक बड़ा झटका है, क्योंकि देश अपने आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ज़रूरी खनिजों की घरेलू खोज (exploration) और उत्पादन (production) को बढ़ाना चाहता है। इन 11 ब्लॉकों में से 5 ब्लॉक को तो एक भी बोली नहीं मिली, जबकि 5 अन्य ब्लॉक में न्यूनतम तीन योग्य बोली लगाने वाले भी नहीं थे।
निवेशक क्यों कर रहे हैं किनारा?
बार-बार निवेशक भागीदारी में कमी का यह पैटर्न दर्शाता है कि सरकार के खनिज लक्ष्यों और निवेशकों की जोखिम उठाने की इच्छाशक्ति के बीच एक बड़ा अंतर है। भले ही लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे खनिजों की वैश्विक मांग बहुत ज्यादा है, लेकिन भारत की नीलामी में निवेशकों की सक्रियता काफी कम बनी हुई है। यह कोई नई बात नहीं है; 2023 से शुरू हुए पिछले ऑक्शन राउंड में भी 81 में से 14 ब्लॉक को कोई बोली नहीं मिली थी, और 33 ब्लॉक में ज़रूरी योग्य बोली लगाने वाले नहीं थे। निवेशकों के पीछे हटने की कुछ मुख्य वजहों में भूवैज्ञानिक डेटा (geological data) की गुणवत्ता पर संदेह, खोज पर भारी लागत (exploration costs), प्रोजेक्ट को विकसित करने में लगने वाला लंबा समय (long development timelines) और नियमों को लेकर अनिश्चितता (uncertain regulations) शामिल हैं। इसके अलावा, दुनिया भर में खनिजों की खोज के लिए फंड (funding) भी कम हुआ है, जिससे निवेशक नए प्रोजेक्ट्स को लेकर फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। खासकर प्राइवेट इक्विटी (private equity) फंड, जो बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए पूंजी जुटाते हैं, वे शुरुआती दौर के जोखिम भरे प्रोजेक्ट्स से आमतौर पर दूर ही रहते हैं।
वैश्विक प्रतियोगिता और निवेशकों की सतर्कता
भारत की यह चुनौती ऐसे समय में सामने आई है जब भू-राजनीतिक (geopolitical) वजहों और सप्लाई चेन को सुरक्षित करने की ज़रूरत के चलते क्रिटिकल मिनरल्स के लिए गलाकाट प्रतियोगिता (intensifying global competition) चल रही है। जब देश अपने संसाधनों पर ज़्यादा नियंत्रण जताते हैं, तो इससे निवेशकों के लिए अनिश्चितता बढ़ सकती है। चीन का कई महत्वपूर्ण खनिजों के प्रोसेसिंग में दबदबा (dominance) भी वैश्विक सप्लाई को और जटिल बना रहा है।
लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे खनिजों में भारत के क्लीन एनर्जी लक्ष्यों के बावजूद, निवेशक अभी भी इन प्रोजेक्ट्स के लिए ज़रूरी भारी पूंजी (high capital costs), लंबा डेवलपमेंट पीरियड, पर्यावरण, सामाजिक और शासन (ESG) से जुड़े नियम और माइनिंग इलाकों में बुनियादी ढांचे (infrastructure) की कमी से हिचकिचा रहे हैं। ग्रेफाइट और लिथियम जैसे खनिजों की कीमतों में उतार-चढ़ाव (volatile prices) भी नए वेंचर्स को लेकर लाभप्रदता (profitability) के अनुमानों को प्रभावित कर रहा है। सरकार ने नियमों को सरल बनाने और प्रोत्साहन देने की कोशिशें की हैं, लेकिन प्रोजेक्ट्स से जुड़े जोखिमों का आकलन करने और उनकी व्यवहार्यता (viability) को समझने में और बेहतर समाधानों की ज़रूरत है।
संरचनात्मक कमियां प्रगति में बाधक
निवेशकों की लगातार कम उपस्थिति भारत के माइनिंग सेक्टर और नीतिगत ढांचे (policy framework) में गहरी संरचनात्मक कमियों (structural weaknesses) की ओर इशारा करती है। पर्याप्त भूवैज्ञानिक डेटा की कमी और निवेशकों के अनुकूल प्रोत्साहन (investor-friendly incentives) की अनुपलब्धता निजी क्षेत्र की भागीदारी के रास्ते में बड़ी बाधाएं हैं। स्थापित माइनिंग देशों के विपरीत, भारत को नए खोज प्रोजेक्ट्स (exploration projects) के लिए पूंजी जुटाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। निवेश अक्सर नए भंडार खोजने की बजाय मौजूदा खदानों का विस्तार करने पर केंद्रित होता है। वर्तमान नीलामी प्रणाली, जिसमें खोज (discovery) के लिए कोई मजबूत प्रोत्साहन नहीं है, इस अंतर को और बढ़ा रही है। सुधारों पर काम चल रहा है, लेकिन प्रोजेक्ट्स को पूरा करने की गति और परमिट व रेगुलेटरी अप्रूवल हासिल करने की जटिलता अभी भी बड़ी बाधाएं हैं। कई कंपनियों के पास माइनिंग प्रोजेक्ट्स को शुरू से अंत तक मैनेज करने का अनुभव भी सीमित है। यह स्थिति भारत के लिए अपने घरेलू क्रिटिकल मिनरल सप्लाई को मजबूत करने की चुनौती को और बढ़ा देती है।
आगे की राह
डीकार्बोनाइजेशन (decarbonization) के प्रयासों और भू-राजनीतिक बदलावों (geopolitical shifts) से प्रेरित क्रिटिकल मिनरल्स के लिए जारी वैश्विक दौड़ भारत को एक महत्वपूर्ण मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। इन ज़रूरी संसाधनों की मांग में भारी बढ़ोतरी का अनुमान है, लेकिन भरोसेमंद घरेलू सप्लाई चेन का निर्माण एक मुश्किल काम है। पिछली नीलामी की विफलताएं दर्शाती हैं कि आत्मनिर्भरता का इरादा मजबूत होने के बावजूद, इन योजनाओं को अमली जामा पहनाने में कई पुरानी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। भविष्य की सफलता शायद नीलामी प्रणाली में सुधार लाने पर निर्भर करेगी, ताकि यह निवेशकों की जोखिम उठाने की क्षमता (investor risk appetites) के साथ बेहतर ढंग से मेल खा सके। इसके अलावा, बेहतर भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (geological surveys), बुनियादी ढांचे का विकास (infrastructure development) और रणनीतिक वैश्विक साझेदारी (strategic global partnerships) भी इस जटिल परिदृश्य में महत्वपूर्ण साबित होंगी।