ऊर्जा सुरक्षा पर मंडरा रहा खतरा
भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर एक बड़ी चुनौती सामने आ गई है। देश के पास मौजूद लिक्विड फ्यूल का स्टॉक केवल 20 से 40 दिनों की जरूरत को पूरा कर सकता है। यह स्तर इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) द्वारा सुझाए गए 90 दिनों के नेट ऑयल इंपोर्ट कवर (Net Oil Import Cover) से काफी कम है। भारत के स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) में अकेले 5.33 मिलियन मीट्रिक टन कच्चा तेल है, जो पूरी क्षमता पर लगभग 9.5 दिनों की सप्लाई दे सकता है। जब इसमें कॉमर्शियल स्टॉक (Commercial Stocks) को जोड़ा जाता है, तो कुल रिजर्व करीब 74 दिनों का कवर देते हैं। यह आंकड़ा जापान जैसे देशों (254 दिन) की तुलना में अभी भी बहुत कम है। हाल में पश्चिम एशिया में बढ़ी भू-राजनीतिक अस्थिरता (Geopolitical Instability) इस सीमित भंडार की कमजोरी को उजागर करती है, जिससे भारत कीमतों में उतार-चढ़ाव और सप्लाई चेन में बाधाओं के प्रति संवेदनशील हो गया है।
विविधीकरण पर सरकार का जोर
PNGRB के सचिव अंजन कुमार मिश्रा ने माना है कि पश्चिम एशिया संकट का भारत पर असर पड़ रहा है, लेकिन उन्होंने आश्वासन दिया है कि सरकार स्थिति की बारीकी से निगरानी कर रही है और जरूरी कदम उठा रही है। फिलहाल किसी भी जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuel) की कमी नहीं है। भारत की मुख्य रणनीति कच्चे तेल (Crude Oil) की सोर्सिंग को विविधतापूर्ण बनाना है। परंपरागत रूप से पश्चिम एशिया पर निर्भर रहने वाला भारत अब रूस (Russia) और वेनेजुएला (Venezuela) जैसे देशों से भी आयात बढ़ा रहा है। साथ ही, मोजाम्बिक, अंगोला, अर्जेंटीना, ब्राजील और कनाडा जैसे देशों से भी सप्लाई की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। 2022 के बाद भारत के कुल आयात में रूसी कच्चे तेल की हिस्सेदारी काफी बढ़ी है, लेकिन अब समग्र निर्भरता कम करने के लिए इसका प्रबंधन किया जा रहा है। यह विविधीकरण रणनीति किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता के जोखिम को कम करती है, खासकर हॉरमूज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण चोकपॉइंट्स (Chokepoints) से गुजरने वाले शिपमेंट को देखते हुए।
कच्चे तेल पर निर्भरता के आर्थिक जोखिम
भारत अपनी जरूरत का लगभग 88-89% कच्चा तेल आयात करता है, जो देश की मैक्रोइकॉनॉमिक कमजोरी (Macroeconomic Vulnerability) को बढ़ाता है। अर्थशास्त्री चेतावनी देते हैं कि अगर वैश्विक तेल की कीमतें लगातार $100 प्रति बैरल से ऊपर बनी रहीं, तो भारत के लिए गंभीर जोखिम पैदा हो सकते हैं। तेल की कीमत में हर $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी से करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) 0.3-0.4% तक बढ़ सकता है और महंगाई (Inflation) 0.35-0.6% तक तेज हो सकती है। लंबे समय तक उच्च तेल कीमतों की स्थिति में जीडीपी ग्रोथ (GDP Growth) 7% से घटकर लगभग 6.5% तक धीमी हो सकती है। इस स्थिति से भारतीय रुपये (Indian Rupee) पर भी दबाव पड़ता है, क्योंकि आयात लागत बढ़ने से विदेशी मुद्रा (Foreign Currency) की मांग बढ़ जाती है। सीमित SPR क्षमता का मतलब है कि भारत तत्काल महंगाई के झटके और संभावित सप्लाई रुकावटों के प्रति सीधे तौर पर संवेदनशील है, खासकर हॉरमूज जलडमरूमध्य जैसे प्रमुख शिपिंग मार्गों पर किसी भी तरह की बाधा आने पर यह जोखिम और बढ़ जाता है। पर्याप्त भंडार वाले देशों के विपरीत, भारत का अल्पकालिक बफर एक लगातार बनी हुई रणनीतिक कमजोरी को दर्शाता है।
भविष्य की राह: विस्तार और विकल्प
इन चुनौतियों से निपटने के लिए, भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा पहलों में तेजी ला रहा है। सरकार ने SPR के फेज II विस्तार को मंजूरी दी है, जिसके तहत चंदीखोल में नई साइटों और पाडुर में विस्तारित सुविधा के माध्यम से 6.5 मिलियन टन की अतिरिक्त भंडारण क्षमता जोड़ी जाएगी। इसके साथ ही, भारत रणनीतिक रूप से वैकल्पिक और स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों (Alternative Energy Sources) की ओर बढ़ रहा है। ग्रीन हाइड्रोजन (Green Hydrogen) और कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन और स्टोरेज (CCUS) जैसी उन्नत स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों में निवेश को प्राथमिकता दी जा रही है, ताकि आयातित जीवाश्म ईंधनों पर दीर्घकालिक निर्भरता कम की जा सके। ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना, भले ही यह एक क्रमिक प्रक्रिया हो, भारत की अर्थव्यवस्था को वैश्विक ऊर्जा बाजार की अस्थिरता और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं (Geopolitical Uncertainties) से बचाने के लिए महत्वपूर्ण हैं।