भारत का डायमंड सेक्टर एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है। फाइनेंशियल ईयर **2026** में लैब-ग्रोन डायमंड्स (LGD) का एक्सपोर्ट वॉल्यूम **1.88 करोड़ कैरेट** तक पहुंच गया है, जिसने पहली बार **1.60 करोड़ कैरेट** के नेचुरल डायमंड एक्सपोर्ट को पीछे छोड़ दिया है।
भारत के डायमंड बाजार में यह बदलाव सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक स्ट्रक्चरल ट्रांसफॉर्मेशन है। एक समय जो नेचुरल डायमंड्स की बादशाहत थी, उसे अब लैब में तैयार हीरों से कड़ी चुनौती मिल रही है।
गिरती कमाई और बदलती प्राथमिकताएं
नेचुरल डायमंड्स के एक्सपोर्ट वैल्यू में भारी गिरावट देखी गई है। FY22 में जहां यह आंकड़ा $24 बिलियन के पीक पर था, वहीं FY26 में गिरकर $12.16 बिलियन पर आ गया है। हालांकि रेटिंग एजेंसी ICRA ने FY27 में 6-8% की मामूली ग्रोथ का अनुमान जताया है, लेकिन कीमतों में अस्थिरता और सस्ते सिंथेटिक विकल्प इसे बड़ी चुनौती दे रहे हैं। लैब-ग्रोन हीरों की कीमतें भी घटकर $71 प्रति कैरेट के करीब आ गई हैं, जो खरीदारों के लिए काफी आकर्षक है।
रेगुलेटरी सख्ती और पारदर्शिता
बाजार की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए Bureau of Indian Standards (BIS) ने जनवरी 2026 में IS 19469:2025 मानक लागू किए हैं। इसका मकसद नेचुरल और लैब-ग्रोन हीरों के बीच स्पष्ट फर्क करना है ताकि खरीदारों के साथ किसी भी तरह का धोखा न हो।
छोटे व्यापारियों पर दबाव
सूरत और मुंबई जैसे मैन्युफैक्चरिंग हब में स्थित छोटी और मध्यम (SME) इकाइयां इस बदलाव से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। पुरानी तकनीक और घटते प्रॉफिट मार्जिन के बीच, इन कंपनियों को बिजनेस मॉडल बदलने या बाजार से बाहर होने का खतरा सता रहा है। अमेरिका और चीन जैसे प्रमुख बाजारों में डिमांड की अस्थिरता ने भी इनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। आने वाला समय यह तय करेगा कि क्या यह शिफ्ट परमानेंट है और क्या मैन्युफैक्चरर्स बढ़ते कर्ज और लागत को मैनेज कर पाएंगे।
