ऊर्जा खरीद में बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव
लाल सागर (Strait of Hormuz) में लगातार आ रही बाधाओं के कारण भारत को अपनी ऊर्जा खरीद की रणनीति में बड़ा बदलाव करना पड़ा है। अब हम मध्य पूर्व के पारंपरिक सप्लायर्स की जगह उत्तरी अमेरिका की ओर रुख कर रहे हैं। हालांकि कुल आयात में 40% की गिरावट दिख रही है, लेकिन असलियत यह है कि पूरी सप्लाई चेन को ही बदल दिया गया है। भारत, जो पहले 90% से ज्यादा LPG मध्य पूर्व से आयात करता था, अब अमेरिका से प्रोपेन (Propane) और ब्यूटेन (Butane) मंगा रहा है। इससे भारत में लैंड करने वाली ऊर्जा की लागत संरचना में बड़ा बदलाव आया है।
लंबी दूरी की शिपिंग की लागत
मध्य पूर्व से छोटी दूरी की शिपिंग की जगह अमेरिका से लंबी दूरी की शिपिंग अपनाना सिर्फ एक भौगोलिक बदलाव नहीं है, बल्कि आर्थिक कुशलता में भी एक बड़ा फेरबदल है। फारस की खाड़ी (Persian Gulf) की तुलना में अमेरिका के गल्फ कोस्ट (US Gulf Coast) से भारत के बंदरगाहों की शिपिंग दूरी लगभग तीन गुना ज्यादा है। इस बदलाव के लिए लगातार सप्लाई बनाए रखने हेतु ज्यादा संख्या में बहुत बड़े गैस वाहक जहाजों (Very Large Gas Carriers - VLGCs) की जरूरत होगी। इससे भारतीय आयातकों के लिए माल भाड़ा (freight rates) और लीड टाइम (lead times) दोनों बढ़ गए हैं। जैसे-जैसे अमेरिका भारत का मुख्य सप्लायर बन रहा है, भारतीय खुदरा विक्रेताओं और औद्योगिक उपयोगकर्ताओं को इन जटिल और लंबी दूरी की सप्लाई नेटवर्क की वजह से बढ़ी हुई कीमतों का बोझ उठाना पड़ेगा।
कमजोरियों और जोखिमों का विश्लेषण
हालांकि अमेरिका से LPG का यह आयात तत्काल कमी को तो रोक रहा है, लेकिन यह स्थिति संस्थागत जोखिमों को बढ़ा रही है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि हम एक ही, दूर स्थित भौगोलिक सप्लायर पर निर्भर हो गए हैं। इससे भारत को समुद्री बीमा प्रीमियम (maritime insurance premiums) और माल भाड़े की कीमतों में उतार-चढ़ाव का ज्यादा सामना करना पड़ेगा। इसके अलावा, आपूर्ति में 6.5% की कमी को पूरा करने के लिए ईरान से आयात बढ़ाने से संभावित नियामक समस्याएं खड़ी हो सकती हैं, खासकर अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों (international sanctions) के अनुपालन को लेकर, जो व्यापार वित्त (trade financing) को जटिल बना सकता है। मध्य पूर्व के क्षेत्रीय व्यापार के विपरीत, अमेरिका-भारत मार्ग पूरी तरह से स्पॉट मार्केट (spot market) की तरलता और विशेष जहाजों की उपलब्धता पर निर्भर है। इससे ऊर्जा बाजार वैश्विक शिपिंग मांग में किसी भी वृद्धि या पनामा नहर (Panama Canal) में लॉजिस्टिकल बाधाओं के प्रति संवेदनशील हो जाता है।
भविष्य का दृष्टिकोण और बाजार संतुलन
विश्लेषक अब इस बात पर नजर रख रहे हैं कि भारतीय सरकारी तेल कंपनियां लगातार उच्च माल भाड़े की लागत के खिलाफ हेजिंग (hedging) की क्या योजना बना रही हैं। अगर लाल सागर (Strait of Hormuz) प्रभावी रूप से बाधित रहता है, तो वर्तमान आयात मिश्रण के स्थिर रहने की उम्मीद है, जिसमें अमेरिकी निर्यातक अपनी नई बाजार हिस्सेदारी बनाए रखेंगे। हालांकि, इस मॉडल की स्थिरता इस धारणा पर निर्भर करती है कि वैश्विक VLGC दरें स्थिर रहें। यदि शिपिंग क्षमता और टाइट होती है, तो वर्तमान बदलाव से भारतीय उपभोक्ताओं के लिए स्थानीय मूल्य वृद्धि हो सकती है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा और सामर्थ्य के बीच एक कठिन समझौता करना पड़ सकता है।
