एनर्जी सिक्योरिटी पर मंडराता खतरा
भारत की लिक्विड नेचुरल गैस (LNG) की ज़रूरतें काफी हद तक मध्य पूर्व पर टिकी हुई हैं, जिसने देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। साल 2024 में, पश्चिमी एशियाई देशों ने भारत के कुल एलएनजी इम्पोर्ट का लगभग 59.5% हिस्सा सप्लाई किया। यह आंकड़ा कई दूसरे बड़े एलएनजी इम्पोर्ट करने वाले देशों की तुलना में काफी ज्यादा है, जो भारत को क्षेत्रीय भू-राजनीतिक तनावों और सप्लाई में आने वाले किसी भी व्यवधान के प्रति और अधिक संवेदनशील बनाता है।
दूसरे देशों से तुलना
जब हम दूसरे प्रमुख एलएनजी इम्पोर्टर्स की बात करते हैं, तो भारत की स्थिति और भी खास नज़र आती है। चीन ने मध्य पूर्व से केवल लगभग 26.5% एलएनजी इम्पोर्ट की, जबकि जापान की निर्भरता महज़ 10.7% थी। दक्षिण कोरिया ने इस क्षेत्र से 35.3% इम्पोर्ट किया, और थाईलैंड ने 26.8%। यूरोपीय देशों की निर्भरता तो और भी कम रही, जहाँ फ्रांस ने सिर्फ 1.3% और नीदरलैंड ने लगभग न के बराबर एलएनजी मध्य पूर्व से मंगाई।
सप्लायर्स की एकाग्रता (Concentration)
आयात के स्रोत में यह एकाग्रता (concentration) जोखिम की एक और परत जोड़ती है। भारत के टॉप पाँच सप्लायर्स (suppliers) मिलकर लगभग 83.5% एलएनजी की आपूर्ति करते हैं। यह वैश्विक औसत 72.4% से काफी ज्यादा है और जापान व दक्षिण कोरिया जैसे देशों की तुलना में भी ज़्यादा एकाग्रता दिखाता है। इस सीमित डाइवर्सिफिकेशन (diversification) से भारत की भेद्यता (vulnerability) और बढ़ जाती है।
डाइवर्सिफिकेशन (Diversification) के प्रयास
हालांकि, इस वर्तमान निर्भरता के बावजूद, डाइवर्सिफिकेशन (diversification) के लिए महत्वपूर्ण अवसर मौजूद हैं। ऑस्ट्रेलिया, जो दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी एक्सपोर्टर (exporter) है, उसने भारी मात्रा में एलएनजी की बिक्री की, लेकिन भारत ने उसके एक्सपोर्ट्स का सिर्फ 0.1% हिस्सा ही खरीदा। अमेरिका (US) से होने वाले एलएनजी एक्सपोर्ट्स में भारत की हिस्सेदारी 7.2% थी, और रूस (Russia) से केवल 0.3%। इसके अलावा, भारत ने मलेशिया (Malaysia) जैसे एक प्रमुख एक्सपोर्टर से कोई एलएनजी इम्पोर्ट नहीं की।
एक सरकारी सूत्र ने यह भी संकेत दिया है कि ग्राहकों पर असर को रोकने के लिए अधिक एलएनजी कार्गो सुरक्षित करने और गैस के आवंटन को प्राथमिकता देने के प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन, भले ही भारत के पास तीन हफ़्तों से ज़्यादा का रिज़र्व (reserves) मौजूद हो, अगर डाइवर्सिफिकेशन (diversification) को तेज़ी से नहीं बढ़ाया गया तो लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष या शिपिंग मार्गों में रुकावटें गंभीर चुनौतियाँ पेश कर सकती हैं।
