India Oil Import Bill: जुलाई में **41%** उछला, पहुंचा **$13.7 बिलियन**

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
India Oil Import Bill: जुलाई में **41%** उछला, पहुंचा **$13.7 बिलियन**

भारत का ऊर्जा आयात जुलाई 2026 में **13%** बढ़कर **2.14 करोड़ मीट्रिक टन** पर पहुंच गया। जहां एक ओर यह बढ़ती घरेलू मांग और आर्थिक गतिविधियों का संकेत है, वहीं वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के कारण आयात बिल में **41%** की भारी बढ़ोतरी देखी गई, जो **$13.7 बिलियन** तक पहुंच गया।

बढ़ी कीमतें, अर्थव्यवस्था पर दबाव

जुलाई 2026 में भारत का कुल कच्चा तेल आयात बिल $13.7 बिलियन रहा, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 41% ज्यादा है। यह आयतन (Volume) में 13% की वृद्धि की तुलना में लागत में काफी तेज बढ़ोतरी को दर्शाता है। इसका मुख्य कारण कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में वृद्धि है। जुलाई 2026 में भारतीय क्रूड बास्केट का औसत मूल्य $82.04 प्रति बैरल था, जो जुलाई 2025 के $70.95 प्रति बैरल से काफी अधिक है। इसका सीधा मतलब है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अब ज्यादा कीमत चुका रहा है, जिसका असर देश के चालू खाते (Current Account Deficit) और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहा है।

घरेलू ईंधन की खपत में भी लगभग 3% की मासिक वृद्धि देखी गई, जो 1.99 करोड़ मीट्रिक टन तक पहुंच गई। यह दिखाता है कि परिवहन, विनिर्माण और लॉजिस्टिक्स जैसी गतिविधियां रफ्तार पकड़ रही हैं, लेकिन आयात पर निर्भरता अभी भी बनी हुई है। रूस इस दौरान भी भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बना रहा, जिसने कुल आयात का 55.5% हिस्सा प्रदान किया।

आयात में बढ़ोतरी का विभिन्न सेक्टरों पर असर

आयात बिल में यह तेज बढ़ोतरी कई सेक्टरों पर असर डाल रही है। जब तेल की कीमतें ऊंची रहती हैं, तो भारतीय रुपये पर भी दबाव बढ़ता है क्योंकि ईंधन के भुगतान के लिए अधिक डॉलर की आवश्यकता होती है। इससे अन्य वस्तुओं और सेवाओं के आयात की लागत भी बढ़ सकती है, जिससे महंगाई को बढ़ावा मिलने की आशंका है।

एविएशन (विमानन), पेंट, रसायन और टायर जैसे उद्योग, जो पेट्रोलियम उत्पादों पर बहुत अधिक निर्भर हैं, विशेष रूप से प्रभावित हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, एयरलाइंस को एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की बढ़ी हुई लागत का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आ सकता है। इसी तरह, केमिकल और पेंट निर्माताओं के लिए इनपुट लागत (Input Cost) बढ़ सकती है, जिससे उनके मुनाफे को स्थिर रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। हालांकि, भारत के पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में 8% सालाना की वृद्धि हुई है, जो व्यापार घाटे (Trade Gap) को कुछ हद तक संतुलित करने में मदद कर रहा है।

बाजार की नजर अब इस बात पर है कि वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें स्थिर होती हैं या नहीं। आने वाले महीनों में, भारतीय रुपये की डॉलर के मुकाबले चाल, बढ़ती ऊर्जा लागतों पर सरकारी प्रतिक्रिया और घरेलू उद्योगों पर महंगी कच्ची सामग्री का प्रभाव मुख्य रूप से देखे जाएंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.