अप्रैल-जून 2026 तिमाही में ईरान को होने वाले भारतीय चावल निर्यात में **64%** की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। अमेरिकी प्रतिबंधों और UAE द्वारा ट्रेड रूट्स बंद करने से सप्लाई चेन पूरी तरह बाधित हो गई है, जिससे एक्सपोर्टर्स के सामने पेमेंट और लॉजिस्टिक्स का संकट खड़ा हो गया है।
ट्रेड रूट्स और पेमेंट का संकट
ईरानी बाजार में भारतीय चावल निर्यातकों के लिए हालात चुनौतीपूर्ण होते जा रहे हैं। साल 2025 की इसी अवधि की तुलना में इस साल अप्रैल-जून तिमाही में एक्सपोर्ट वॉल्यूम में 64% की बड़ी गिरावट देखी गई है। इसका मुख्य कारण नए अमेरिकी प्रतिबंध हैं और UAE का व्यापारिक और वित्तीय लेनदेन से पीछे हट जाना, जो अब तक भुगतान और शिपिंग के लिए एक प्रमुख माध्यम बना हुआ था।
अब निर्यातक तुर्की, चीन और जर्मनी के जरिए नए पेमेंट कॉरिडोर बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह प्रक्रिया काफी महंगी और जटिल है। बैंकिंग चैनल्स न होने के कारण पहले से भेजे गए माल का भुगतान मिलना भी एक बड़ी समस्या बन गया है।
लागत में बढ़ोतरी और मार्जिन पर दबाव
चावल का निर्यात 'ह्यूमैनिटेरियन गुड्स' (मानवीय आधार पर जरूरी वस्तुएं) की श्रेणी में आता है, जिसके कारण इसे अन्य कमोडिटीज की तुलना में थोड़ी राहत मिलती है। हालांकि, मौजूदा हालात में ऑपरेशन्स चलाना मुश्किल हो रहा है। पुराने रूट बंद होने से फ्रेट चार्ज और इंश्योरेंस प्रीमियम में भारी उछाल आया है, जिसका सीधा असर कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ रहा है। पेमेंट साइकिल लंबी होने के कारण एक्सपोर्टर्स की वर्किंग कैपिटल भी फंसती जा रही है।
निवेशकों के लिए क्या हैं रिस्क?
अमेरिकी ट्रेजरी ने उन भारतीय कंपनियों को लेकर चेतावनी जारी की है जो ईरान के साथ व्यापार जारी रखती हैं। भले ही खाद्यान्न व्यापार को कुछ सुरक्षा मिली हो, लेकिन नियमों के सख्त होने का खतरा बना हुआ है। अब बाजार की नजर इस बात पर है कि क्या तुर्की और चीन के रास्ते व्यापार को फिर से स्थिर किया जा सकेगा। निवेशकों को आने वाली तिमाहियों में कैश फ्लो और पेमेंट रिकवरी पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि लागत में हो रही बढ़ोतरी बड़ी राइस मिलिंग कंपनियों के लिए बड़ा रिस्क है।
