भारत में सोने को लेकर नजरिया पूरी तरह बदल गया है। पहली बार निवेश के रूप में सोने की मांग, पारंपरिक ज्वेलरी की खपत से आगे निकल गई है। Gold ETF का एसेट बेस **₹1.9 ट्रिलियन** के करीब पहुंच गया है, हालांकि आयात शुल्क (Import Duty) और म्यूचुअल फंड पर लगी पाबंदियां निवेशकों के लिए नई चुनौतियां लेकर आई हैं।
भारतीय गोल्ड मार्केट में साल 2026 एक बड़े बदलाव का गवाह बना है। पहली बार गोल्ड बार, सिक्के और गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETFs) की मांग ने पारंपरिक गहनों की बिक्री को पछाड़ दिया है। यह इस बात का संकेत है कि अब भारतीय घरों में सोना केवल श्रृंगार नहीं, बल्कि पोर्टफोलियो का एक अहम हिस्सा बन चुका है।
फाइनेंशियल सोने की बढ़ती चमक
डिजिटल दौर के नए निवेशक अब फिजिकल ज्वेलरी के 'मेकिंग चार्ज' और उसे रखने के रिस्क से दूर रहना चाहते हैं। इसका सीधा असर Gold ETF पर दिख रहा है। अक्टूबर 2026 तक देश में Gold ETF का एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) उछलकर ₹1.9 ट्रिलियन के स्तर को पार कर गया है। युवा और डिजिटल साक्षर निवेशक इसे बेहतर लिक्विडिटी और पारदर्शिता वाला विकल्प मान रहे हैं।
आयात शुल्क और रेगुलेटरी बदलाव
इस ग्रोथ के बीच कुछ चुनौतियां भी खड़ी हुई हैं। मई 2026 में सरकार ने सोने और चांदी पर प्रभावी आयात शुल्क को 6% से बढ़ाकर 15% कर दिया, ताकि फॉरेन एक्सचेंज के आउटफ्लो पर लगाम लगाई जा सके। इससे घरेलू बाजार में सोने की कीमतों में बड़ा उछाल आया, जिसका सीधा असर रिटेल ज्वेलर्स की डिमांड वॉल्यूम पर पड़ा है।
म्यूचुअल फंड्स पर लगी रोक
रेगुलेटरी सख्ती भी बढ़ गई है। अक्टूबर 2026 में करीब 17 म्यूचुअल फंड हाउसों ने कुछ Gold ETF फंड ऑफ फंड्स में फ्रेश निवेश पर अस्थाई रोक लगा दी। यह कदम मार्केट में इनफ्लो को मैनेज करने और सरकारी गाइडलाइन्स का पालन करने के लिए उठाया गया था। निवेशकों को अब समझ लेना चाहिए कि गोल्ड जैसे सुरक्षित विकल्प में निवेश करते समय भी लिक्विडिटी और सरकारी नियमों पर नजर रखना बेहद जरूरी है।
आने वाले समय में सोने की बढ़ती कीमतें लोगों के खर्च करने के तरीके (discretionary spending) को प्रभावित कर सकती हैं, जिस पर निवेशकों को बारीक नजर रखनी होगी।
