गोल्ड इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़कर **15%** होने के बाद देश में तस्करी (smuggling) का बाजार गर्म हो गया है। गैर-कानूनी सोना आधिकारिक कीमतों से **₹8,000** प्रति **10 ग्राम** तक सस्ता मिल रहा है, जिससे टैक्स भरने वाले ज्वेलरी रिटेलर्स के लिए मुसीबत बढ़ गई है।
मई 2026 में गोल्ड इम्पोर्ट ड्यूटी को 15% तक बढ़ाने के फैसले के बाद भारतीय सर्राफा बाजार में बड़ी हलचल मची है। ड्यूटी बढ़ने के कारण अब अवैध बाजार (grey market) सक्रिय हो गया है, जहाँ सोना आधिकारिक दरों से ₹8,000 प्रति 10 ग्राम तक के डिस्काउंट पर उपलब्ध है। इस बड़े प्राइस अंतर के कारण संगठित क्षेत्र के ज्वेलरी रिटेलर्स के लिए प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो गया है, क्योंकि उनकी लागत ऊंचे टैक्स स्ट्रक्चर में बंधी हुई है।
सरकारी डेटा बनाम हकीकत
इन्वेस्टर्स के लिए चिंता की बात यह है कि सरकारी आंकड़ों और असली डिमांड के बीच एक बड़ा फासला बन गया है। जून 2026 तिमाही में भारत का नेट गोल्ड इम्पोर्ट साल-दर-साल 23% गिरकर 98.1 टन पर आ गया, जो सितंबर 2020 के बाद का निचला स्तर है। हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह डिमांड में कमी नहीं, बल्कि सोने की सोर्सिंग के अवैध रास्तों की ओर शिफ्ट होने का संकेत है।
तस्करी पर लगाम की कोशिशें
ऐतिहासिक रूप से, ड्यूटी बढ़ने पर तस्करी के मामले बढ़े हैं। Directorate of Revenue Intelligence (DRI) ने अपनी कार्रवाई तेज कर दी है और हाल ही में 27 किलोग्राम सोना जब्त भी किया है, लेकिन भारी मुनाफे के चलते तस्करों के नेटवर्क फिर से सक्रिय हो गए हैं। 'All India Gem & Jewellery Domestic Council' जैसी संस्थाएं लगातार सरकार से इम्पोर्ट ड्यूटी घटाकर 5% करने की मांग कर रही हैं ताकि संगठित व्यापार को बचाया जा सके।
निवेशकों के लिए जोखिम
ऑर्गेनाइज्ड ज्वेलरी कंपनियों के शेयरधारकों के लिए सबसे बड़ा रिस्क 'मार्जिन प्रेशर' है। यदि ग्रे मार्केट इसी तरह रिटेल डिमांड को अपनी ओर खींचता रहा, तो लिस्टेड ज्वेलरी रिटेलर्स की सेल्स वॉल्यूम घट सकती है। इसके अलावा, टैक्स और कस्टम्स की चोरी रोकने के लिए सरकार द्वारा बढ़ाई गई सख्ती से फॉर्मल सेक्टर की कंप्लायंस लागत (compliance cost) भी बढ़ सकती है। आने वाले फेस्टिव सीजन की बिक्री यह तय करेगी कि क्या दिग्गज कंपनियां ग्राहकों को अपने साथ बनाए रखने में कामयाब रहती हैं या नहीं।
