Gold Duty Hike: क्या सरकार की चाल फिस्कल पॉलिसी पर पड़ेगी भारी?

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AuthorNeha Patil|Published at:
Gold Duty Hike: क्या सरकार की चाल फिस्कल पॉलिसी पर पड़ेगी भारी?
Overview

नई दिल्ली के **15%** गोल्ड इंपोर्ट ड्यूटी के फैसले से फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व को सहारा मिलने की उम्मीद है, लेकिन यह कदम करोड़ों डॉलर के ज्वैलरी एक्सपोर्ट को बड़ा झटका दे सकता है। सरकार की यह नीति, शॉर्ट-टर्म करेंसी को बचाने के चक्कर में लॉन्ग-टर्म इंडस्ट्रियल कॉम्पिटिटिवनेस को नुकसान पहुंचा रही है। ऐसे में, एक्सपोर्ट रेवेन्यू में गिरावट आई तो करेंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) घटने की बजाय और बढ़ सकता है।

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इंपोर्ट रोकने की गलत थ्योरी

इम्पोर्ट ड्यूटी को अचानक 15% तक बढ़ाना, भारतीय रुपये (Indian Rupee) में लगातार आ रही गिरावट पर सरकार का रिएक्शन बताता है। गोल्ड को डॉलर रिजर्व पर सिर्फ एक गैर-उत्पादक बोझ के तौर पर देखकर, पॉलिसी मेकर्स ने इंडिया के ट्रेड मैकेनिज्म की बारीकियों को नजरअंदाज कर दिया है। हालांकि, एनर्जी के बढ़ते दाम के बीच कैपिटल के फ्लो को रोकने का मकसद है, लेकिन यह कदम ज्वैलरी बनाने वाले सेक्टर की प्राइस इलास्टिसिटी को नजरअंदाज करता है। जब रॉ मटेरियल की कॉस्ट इतनी तेजी से बढ़ती है, तो तैयार माल की महंगाई (inflationary pressure) देश के वैल्यू-एडेड एक्सपोर्ट को कमजोर कर देती है, जिससे बैलेंस ऑफ पेमेंट में होने वाले फायदे पर पानी फिर जाता है।

इंडस्ट्रियल कॉम्पिटिटिवनेस और ग्लोबल फ्लो

जहां आम कंज्यूमर अपनी खरीदारी टाल सकता है, वहीं ऑर्गेनाइज्ड ज्वैलरी सेक्टर बहुत कम मार्जिन पर काम करता है और सप्लाई चेन पर निर्भर रहता है। पिछले डाटा बताते हैं कि ड्यूटी में ऐसे बदलाव अक्सर अनौपचारिक (grey market) गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं। इससे सरकार को टैक्स रेवेन्यू का नुकसान होता है और कुल डिमांड में खास कमी नहीं आती। साथ ही, दुनिया के दूसरे देशों जैसे तुर्की या इटली के मुकाबले, जिनका प्रीशियस मेटल प्रोसेसिंग के लिए ज्यादा फ्लेक्सिबल सिस्टम है, इंडियन इंडस्ट्री अब एक बड़ी कॉस्ट डिसएडवांटेज का सामना कर रही है। जब डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरर्स इन बढ़ी हुई लागतों को झेलने में संघर्ष करेंगे, तो ग्लोबल खरीदार उन मार्केट्स की ओर रुख करेंगे जहां रॉ मटेरियल आसानी से मिलता है। इससे देश फिनिश्ड गुड्स के एक्सपोर्ट की बजाय रॉ मटेरियल इंपोर्ट पर और ज्यादा निर्भर हो जाएगा।

पॉलिसी की कमजोरी का स्ट्रक्चरल रिस्क

इस फैसले में सबसे बड़ा खतरा यह सोचना है कि करेंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) सिर्फ डिमांड की वजह से है। ज्वैलरी इंडस्ट्री, जो फॉरेन एक्सचेंज का नेट जरनेटर है, उसे नजरअंदाज करके सरकार इंपोर्ट बिल बचाने के लिए अपने ही एक्सपोर्टर्स को सजा दे रही है। इन्वेस्टर्स को मुंबई और सूरत जैसे बड़े हब से आने वाले तिमाही एक्सपोर्ट के आंकड़ों पर करीब से नजर रखनी चाहिए। एक्सपोर्ट वॉल्यूम में किसी भी बड़ी गिरावट का मतलब होगा कि पॉलिसी अपने मकसद के ठीक उलट काम कर रही है। इसके अलावा, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) का लगातार रुपये को स्टेबल करने का प्रयास बताता है कि पॉलिसी मेकर्स के पास पारंपरिक तरीके खत्म हो रहे हैं। अगर गोल्ड ड्यूटी से रुपये की गिरावट नहीं रुकी, तो और सख्त रेगुलेटरी कदम उठाए जाएंगे, जिससे कमोडिटी से जुड़े शेयरों और लग्जरी रिटेलर्स के लिए अनिश्चितता का माहौल बनेगा।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.