इंपोर्ट पर लगाम, डोमेस्टिक प्रोडक्शन में तेजी
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना खरीदार है, जो सालाना करीब 800 टन की खपत करता है। अब तक, यह मांग पूरी तरह से इंपोर्ट पर निर्भर रही है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर काफी दबाव पड़ा है। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में, रिकॉर्ड $71.98 बिलियन (721.03 टन) का सोना इंपोर्ट किया गया, जिसका मुख्य कारण सोने की बढ़ती कीमतें थीं। जोंनागिरी प्रोजेक्ट से हर साल 1,000 किलोग्राम (1 टन) सोने का उत्पादन घरेलू सप्लाई को बढ़ाने की दिशा में एक अहम कदम है। इससे पिछले साल 2024 में भारत में कुल सोने की मांग 5% बढ़कर 802.8 टन तक पहुंच गई थी। यह माइन प्राइवेट कंपनियों के लिए बड़े पैमाने पर सोने के खनन का एक नया रास्ता खोलेगी, जो पहले ज्यादातर सरकारी कंपनियों जैसे हुट्टी गोल्ड माइंस (Hutti Gold Mines) तक सीमित था। 2000 में कोलार गोल्ड फील्ड्स (Kolar Gold Fields) के बंद होने के बाद से डोमेस्टिक प्रोडक्शन में कमी आई थी।
एक्सपर्ट्स को निवेश की उम्मीद
जिओमाइसोर के डायरेक्टर डॉ. हनुमा प्रसाद मोडाली (Dr. Hanuma Prasad Modali) का मानना है कि जोंनागिरी प्रोजेक्ट की सफलता भारत में सोने और अन्य महत्वपूर्ण मिनरल्स (Critical Minerals) के सेक्टर में और ज्यादा निवेश को बढ़ावा देगी। उनका अनुमान है कि अगले एक दशक में भारत सालाना 50 से 100 टन तक घरेलू उत्पादन हासिल कर सकता है, जो मौजूदा 1.5 टन के मुकाबले काफी बड़ी छलांग होगी। इस प्रोजेक्ट के प्रोसेसिंग प्लांट को रिकॉर्ड 13 महीनों में तैयार किया गया है। FY25 में $76,617.48/kg से बढ़कर FY26 में सोने की कीमत $99,825.38/kg तक पहुंचना, भारत के इंपोर्ट बिल और ट्रेड डेफिसिट को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। सोना अभी भी निवेशकों के लिए महंगाई (Inflation) से बचाव का एक महत्वपूर्ण जरिया बना हुआ है।
इंपोर्ट पर निर्भरता कम करने की चुनौतियां
जोंनागिरी माइन से सालाना 1 टन सोने का उत्पादन, भारत के विशाल इंपोर्ट बिल पर तत्काल कोई बड़ा असर डालने वाला नहीं है, खासकर तब जब सालाना 700-800 टन की मांग और डोमेस्टिक प्रोडक्शन सिर्फ 1.5-3 टन है। ग्लोबल गोल्ड मार्केट काफी वोलेटाइल (Volatile) है और कुछ बड़ी कंपनियां ही इसे डोमिनेट करती हैं। भारत की गोल्ड रिफाइनिंग कैपेसिटी (Gold Refining Capacity) अनुमानित 1,800 टन है, जिसमें केवल एक LBMA-accredited रिफाइनरी है। बाजार का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अनऑर्गनाइज्ड ऑपरेटर्स के जरिए चलता है, जिसका मतलब है कि कैपेसिटी अभी भी खपत से काफी कम है। हालांकि, सरकार के सहयोग से जोंनागिरी प्रोजेक्ट की प्रक्रिया आसान हुई है, लेकिन भविष्य में बड़े माइनिंग प्रोजेक्ट्स को लैंड एक्विजिशन, एनवायर्नमेंटल क्लीयरेंस और कम्युनिटी के साथ संबंध जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। सबसे बड़ा जोखिम यह है कि क्या घरेलू प्रोडक्शन को मांग के हिसाब से बढ़ाया जा सकता है, वरना भारत इंपोर्ट पर 86% निर्भर रहेगा, जिससे अर्थव्यवस्था प्राइस शॉक (Price Shocks) और सप्लाई चेन रिस्क (Supply Chain Risks) के प्रति अधिक संवेदनशील रहेगी।
सोने की आत्मनिर्भरता की ओर एक कदम
जोंनागिरी गोल्ड माइन भारत के माइनिंग सेक्टर के लिए एक प्रतीकात्मक और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कदम है। यह तुरंत इंपोर्ट पर निर्भरता खत्म नहीं करेगा, लेकिन इसकी सफलता और ज्यादा प्राइवेट निवेश आकर्षित कर सकती है और एक मजबूत डोमेस्टिक गोल्ड सप्लाई चेन बनाने में मदद कर सकती है। यह प्रोजेक्ट जिम्मेदारीपूर्ण और वैश्विक मानकों के अनुसार माइनिंग को बढ़ावा देगा। भारत जैसे बड़े सोने के उपभोक्ता देश के लिए, जोंनागिरी जैसे डेवलपमेंट आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ाने और ग्लोबल मार्केट के उतार-चढ़ाव के प्रति भेद्यता (Vulnerability) को कम करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
