इथेनॉल प्रोड्यूसर्स मालामाल, किसान परेशान!
भारत सरकार जहाँ इथेनॉल ब्लेंडिंग (Ethanol Blending) के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए जोर लगा रही है, वहीं इसका सीधा असर मक्के की खेती करने वाले किसानों पर पड़ रहा है। साल 2024-25 में मक्के का प्रोडक्शन बढ़कर 43.4 मिलियन टन तक पहुँच गया है, लेकिन मंडियों में किसानों को एमएसपी ₹2,400 प्रति क्विंटल से काफी कम दाम मिल रहे हैं। अप्रैल 2026 तक मक्के का औसत दाम मंडियों में सिर्फ ₹1,766 प्रति क्विंटल रहा। इसके उलट, इथेनॉल बनाने वाली कंपनियों को ₹71.86 प्रति लीटर का फिक्स्ड रेट मिलता है, जो उन्हें गारंटीड प्रॉफिट (Guaranteed Profit) दिलाता है। इस वजह से इथेनॉल बनाने वाली कंपनियां किसानों से एमएसपी से ₹600 से ₹700 प्रति क्विंटल कम दाम पर कच्चा माल खरीद पा रही हैं।
इम्पोर्ट्स और क्रॉप डाइवर्जन ने बढ़ाई किसानों की मुश्किलें
साल 2024-25 में भारत ने 1.07 मिलियन टन मक्के का इम्पोर्ट (Import) भी किया है। विदेशी मक्के की यह सप्लाई देसी मक्के की कीमतों पर और दबाव डाल रही है। सरकारी स्टॉक से चावल का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में करने की पॉलिसी भी मक्के की डिमांड को कम कर रही है, जिससे किसानों के लिए कीमतें और अनिश्चित हो गई हैं। पोल्ट्री सेक्टर भी मक्के का बड़ा खरीदार है, लेकिन इथेनॉल सेक्टर की फिक्स्ड इकोनॉमिक्स (Fixed Economics) ने पूरे मार्केट की तस्वीर बिगाड़ दी है।
पॉलिसी की खामियां किसानों को कर रही उजागर
ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण लक्ष्यों के लिए इथेनॉल ब्लेंडिंग का बढ़ाया जाना एक अहम कदम है, लेकिन इस पॉलिसी में कई बड़ी खामियां नज़र आ रही हैं। सरकार द्वारा मक्के की खेती बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन देने के बावजूद, किसानों से पर्याप्त खरीददारी न होना और एमएसपी (MSP) लागू न हो पाना किसानों को बेहद कमजोर बना रहा है। इथेनॉल के लिए जहाँ स्टेबल, सरकारी रेट्स हैं, वहीं मक्के के किसानों को मार्केट की वोलेटिलिटी (Volatility) और इम्पोर्ट्स के दबाव का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में, प्रोडक्शन बढ़ने के बावजूद किसानों की कमाई नहीं बढ़ रही, बल्कि वे नुकसान में हैं। भविष्य में, इससे किसानों का बुआई का इरादा कम हो सकता है, जिससे खाने और पशुओं के चारे की सप्लाई पर असर पड़ सकता है।
आगे क्या? किसानों को राहत के लिए पॉलिसी में बदलाव जरूरी
विश्लेषकों का मानना है कि भारत के इथेनॉल प्रोग्राम को टिकाऊ बनाने के लिए आर्थिक फायदों का बँटवारा ज्यादा बेहतर तरीके से होना चाहिए। जब तक पॉलिसी में ऐसे बदलाव नहीं किए जाते, जिससे मक्के के किसानों के लिए कीमतें स्थिर रहें या उन्हें सीधा सपोर्ट मिले, तब तक उनकी मुश्किलें बनी रहेंगी। यह स्थिति भविष्य में बुआई कम होने, सप्लाई चेन में दिक्कतें आने या फिर इथेनॉल टारगेट्स को पूरा करने के लिए इम्पोर्ट्स पर ज्यादा निर्भर रहने का कारण बन सकती है। पॉलिसी के लक्ष्यों और किसानों की आर्थिक हकीकत के बीच का यह गैप एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है।
