Electronic Gold Receipts (EGR): भारत में सुस्त पड़ी EGR की चाल, टैक्स और लिक्विडिटी की बड़ी मार

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AuthorNeha Patil|Published at:
Electronic Gold Receipts (EGR): भारत में सुस्त पड़ी EGR की चाल, टैक्स और लिक्विडिटी की बड़ी मार

Electronic Gold Receipts (EGRs) निवेशकों के बीच अपनी पकड़ बनाने में संघर्ष कर रहे हैं। हाई टैक्स और कम वॉल्यूम के कारण यह गोल्ड ईटीएफ (Gold ETFs) की तुलना में निवेशकों के लिए कम आकर्षक विकल्प बनकर रह गया है।

टैक्स पॉलिसी का पेच

EGR को लेकर सबसे बड़ी समस्या टैक्स स्ट्रक्चर है। जब भी कोई निवेशक अपने डिजिटल EGR को फिजिकल गोल्ड में बदलना चाहता है, तो उसे 3% जीएसटी देना पड़ता है। खुदरा निवेशकों के लिए यह किसी जुर्माने से कम नहीं है, जिन्होंने पहले ही सोने की खरीदारी पर टैक्स चुकाया है। वहीं, ज्वेलर्स के लिए मामला और भी पेचीदा है क्योंकि इनपुट टैक्स क्रेडिट न मिल पाने की वजह से यह बिजनेस के लिहाज से घाटे का सौदा बन जाता है।

लिक्विडिटी की भारी कमी

स्टॉक एक्सचेंज पर गोल्ड ईटीएफ के मुकाबले EGR में ट्रेडिंग वॉल्यूम बेहद कम है। अक्सर रोजाना का कारोबार ₹1 करोड़ के स्तर को भी पार नहीं कर पाता। लिक्विडिटी न होने की वजह से 'बाय और सेल' प्राइस में काफी बड़ा अंतर (स्प्रेड) देखने को मिलता है, जिससे बड़े ऑर्डर देना या पोजीशन से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।

इन्फ्रास्ट्रक्चर और पहुंच का अभाव

डिजिटल गोल्ड को फिजिकल रूप में बदलने की प्रक्रिया अभी केवल बड़े शहरों जैसे मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद और चेन्नई तक सीमित है। छोटे शहरों के निवेशकों के लिए यह पहुंच से बाहर है। इसके अलावा, शुद्धता की जांच (प्योरिटी टेस्टिंग) और मेकिंग चार्जेस की अतिरिक्त लागत इसे गोल्ड ईटीएफ या सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड जैसे अन्य विकल्पों के मुकाबले महंगा और कम प्रभावी बना देती है।

फिलहाल, एक्सचेंज और रेगुलेटर्स का जोर घरेलू सोने को फॉर्मल सिस्टम में लाने पर है, लेकिन निवेशकों के लिए इसे व्यावहारिक बनाने हेतु जीएसटी के नियमों में बदलाव और वॉल्ट नेटवर्क का विस्तार करना अनिवार्य कदम होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.