'डिजिटल गोल्ड' का रेगुलेटरी पेंच
भारत का सोना बाज़ार तेज़ी से फिजिकल होल्डिंग्स से डिजिटल विकल्पों की ओर बढ़ रहा है। इस बदलाव से निवेशक कीमती धातुओं तक पहुँचने का तरीका बदल रहे हैं। NSE के इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स (EGRs) और Dhan Gold Vault इस ट्रांसफॉर्मेशन में आगे हैं। लेकिन, इनके रेगुलेटरी ओवरसाइट (regulatory oversight) और निवेशक सुरक्षा फ्रेमवर्क में एक बड़ा अंतर है, जो रेगुलेटेड सिक्योरिटीज को कम रेगुलेटेड डिजिटल एसेट्स से अलग करता है।
डिजिटल गोल्ड का बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है, जिसके 2026-2027 तक ₹9,841 करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है। इसमें सालाना 30-35% की ग्रोथ देखी जा रही है। UPI की आसान पेमेंट, सोने की बढ़ती कीमतें (जो इस साल Nifty 50 से आगे निकल गई हैं) और ग्लोबल इकोनॉमी में आई अनिश्चितता ने डिजिटल गोल्ड को लोकप्रिय बनाया है। लेकिन, NSE के EGRs और दूसरे कई डिजिटल गोल्ड प्रोडक्ट्स के बीच एक बड़ा फर्क है - रेगुलेशन का।
EGRs vs Dhan Vault: एक गहरी नज़र
NSE के EGRs, SEBI द्वारा रेगुलेटेड सिक्योरिटीज हैं। ये एक्चुअल फिजिकल गोल्ड को रिप्रेजेंट करते हैं जो एक मान्यता प्राप्त तिजोरी (vault) में रखा जाता है। ये एक्सचेंज पर ट्रेड होते हैं और स्टॉक की तरह ही निवेशकों को सुरक्षा देते हैं। इस तिमाही में स्टॉक की तरह T+1 सेटलमेंट होता है। वहीं, Dhan Gold Vault आपको MCX बुलियन फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट्स के ज़रिए फिजिकल गोल्ड खरीदने की सुविधा देता है, जिसे एक्सचेंज-रेगुलेटेड वॉल्ट्स में रखा जाता है। स्वामित्व COMRIS अकाउंट के ज़रिए ट्रैक होता है। हालांकि, Dhan के इंफ्रास्ट्रक्चर में MCX जैसी SEBI-रेगुलेटेड एंटिटीज़ शामिल हैं, पर सीधे डिजिटल गोल्ड प्रोडक्ट में रेगुलेशन को लेकर सवाल उठे हैं। SEBI ने नवंबर 2025 में ही ऐसे अनरेगुलेटेड प्रोडक्ट्स से सावधान रहने की सलाह दी थी।
अनरेगुलेटेड डिजिटल गोल्ड के खतरे
Dhan जैसे डिजिटल गोल्ड प्लेटफॉर्म्स की सुविधा के पीछे छिपे रिस्क को समझना ज़रूरी है। कई डिजिटल गोल्ड प्रोडक्ट्स SEBI के दायरे में नहीं आते, जिससे प्लेटफॉर्म फेल होने पर निवेशकों को कोई कानूनी सुरक्षा नहीं मिलती। यह EGRs या Gold ETFs जैसे रेगुलेटेड प्रोडक्ट्स से बिल्कुल अलग है। EGRs भले ही रेगुलेटेड हैं, लेकिन इनकी लिक्विडिटी (liquidity) अभी कम है और बिड-आस्क स्प्रेड (bid-ask spreads) ज़्यादा होने से ट्रांज़ैक्शन कॉस्ट बढ़ सकती है। Dhan के प्लेटफॉर्म पर सालाना फीस और ब्रोकरेज भी लगता है। इसलिए, ऐसे किसी भी प्रोडक्ट में निवेश करने से पहले अच्छी तरह रिसर्च ज़रूरी है।
रेगुलेटेड गोल्ड इन्वेस्टमेंट का बढ़ता चलन
विश्लेषकों का मानना है कि निवेशक अब पारदर्शी और लिक्विड गोल्ड इन्वेस्टमेंट की ओर ज़्यादा आकर्षित होंगे। Gold ETFs, जो SEBI रेगुलेशन, हाई लिक्विडिटी और कम खर्च (मेकिंग चार्ज और स्टोरेज फीस से मुक्ति) के कारण पसंद किए जा रहे हैं, उनका असेट्स अंडर मैनेजमेंट मार्च 2026 तक ₹1.7 लाख करोड़ तक पहुँच गया है। ये आमतौर पर 1 ग्राम 99.5% शुद्ध सोने को रिप्रेजेंट करते हैं और एक्सचेंज पर ट्रेड होते हैं। EGRs सीधे फिजिकल गोल्ड में बदलने की सुविधा देते हैं और SEBI रेगुलेटेड हैं, पर उनकी बाज़ार में पैठ और लिक्विडिटी अभी धीरे-धीरे बढ़ रही है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का खुद का मार्केट कैप ₹5,17,275.00 करोड़ है जिसका P/E रेश्यो 42.45 है। यह ट्रेंड बताता है कि बाज़ार में ETFs और EGRs जैसे रेगुलेटेड, लिक्विड और ट्रांसपेरेंट प्रोडक्ट्स को प्राथमिकता मिल रही है, न कि कम रेगुलेटेड डिजिटल गोल्ड स्कीमों को।
