लेटेस्ट डेटा के अनुसार, फरवरी के अंत से भारत का कच्चे तेल का भंडार 10.7 करोड़ बैरल से घटकर 9.1 करोड़ बैरल रह गया है। भारत में रोजाना लगभग 50 लाख बैरल (5 million barrels) तेल की खपत होती है, ऐसे में यह 18 दिनों का बफर स्टॉक बेहद चिंताजनक है।
आयात में कमी और ग्लोबल टेंशन बनी वजह
इस बड़ी गिरावट की मुख्य वजह है कच्चे तेल का आयात (Import) बुरी तरह प्रभावित होना। ईरान में चल रहे संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण शिपिंग रूट्स पर आए संकट के कारण आयात में भारी कमी आई है।
बढ़ती कीमतें और सप्लाई की किल्लत
दुनिया भर में भी तेल की सप्लाई टाइट बनी हुई है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के मुताबिक, ग्लोबल तेल सप्लाई में 1.28 करोड़ बैरल प्रतिदिन की कटौती हुई है। मार्च में ग्लोबल इन्वेंट्री 12.9 करोड़ बैरल और अप्रैल में 11.7 करोड़ बैरल घटी। इसके चलते क्रूड ऑयल की कीमतें आसमान छू रही हैं। 15 मई 2026 को ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) $106.84 और WTI $102.29 प्रति बैरल पर पहुंच गया। पिछले महीने ही ब्रेंट क्रूड 12% से ज्यादा महंगा हुआ है।
भारत की निर्भरता और डायवर्सिफिकेशन के प्रयास
भारत अपनी तेल जरूरतों के लिए भारी आयात पर निर्भर है, जिसमें 52% तेल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर आता है। सरकार ने सप्लायर्स की संख्या 27 से बढ़ाकर 41 देशों तक कर ली है, लेकिन नए स्रोत पुराने आयात की कमी को पूरी तरह से भर नहीं पाए हैं।
स्ट्रेटेजिक रिजर्व्स भी चिंता का विषय
इसके अलावा, भारत का अपना स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) भी बड़े देशों की तुलना में काफी कम है। मई 2026 तक यह सिर्फ 2.1 करोड़ बैरल है, जबकि चीन के पास 154.1 करोड़ बैरल और अमेरिका के पास 41.3 करोड़ बैरल का भंडार है। सप्लाई की दिक्कतें झेल रहा जापान 205 दिनों की सप्लाई का स्टॉक रखता है।
अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा असर
ऊर्जा की बढ़ती कीमतों का असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है। मूडीज रेटिंग्स (Moody's Ratings) ने 2026 के लिए भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान घटाकर 6.8% से 6.0% कर दिया है। इसका मुख्य कारण है कि ऊंची ऊर्जा कीमतों और ईंधन की कमी से कंज्यूमर स्पेंडिंग और इंडस्ट्रियल एक्टिविटी कमजोर हुई है। हालांकि, ADB ने FY2026 के लिए 6.9% ग्रोथ का अनुमान लगाया है, लेकिन उसने भी ग्लोबल अनिश्चितता और वोलेटाइल एनर्जी प्राइसेज का जिक्र किया है।
रिफाइनरियों पर बढ़ सकता है दबाव
इस स्थिति का सीधा असर रिफाइनरी ऑपरेशंस पर पड़ रहा है। अगर आपूर्ति और बाधित होती है, तो रिफाइनरियों को उत्पादन (Output) घटाना पड़ सकता है। इससे घरेलू ईंधन की सप्लाई कम हो जाएगी, महंगाई बढ़ेगी और सरकार पर सब्सिडी का बोझ और बढ़ेगा।
भविष्य की रणनीति
आने वाले समय में यानी तीसरी तिमाही 2026 तक ग्लोबल ऑयल मार्केट में सप्लाई की कमी बने रहने की आशंका है। भारत सरकार भविष्य के झटकों से निपटने के लिए सप्लाय चेन डाइवर्सिफाई करने और स्ट्रैटेजिक रिजर्व को बेहतर बनाने पर जोर दे रही है। रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी (Electric Mobility) को बढ़ावा देना भी लंबी अवधि की रणनीति का हिस्सा है, लेकिन तत्काल कच्चे तेल की सप्लाई सुनिश्चित करना सबसे बड़ी प्राथमिकता बनी हुई है।