ग्लोबल टेंशन के चलते भारत का क्रूड ऑयल इंपोर्ट बास्केट अब **$101.07** प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण रुपये में कमजोरी और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के मुनाफे पर दबाव साफ नजर आ रहा है।
बढ़ते दाम और इकोनॉमी पर असर
4 सितंबर, 2026 तक भारत का क्रूड ऑयल बास्केट $101.07 प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर चुका है। इस उछाल की मुख्य वजह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव है, जिससे होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होने वाली सप्लाई में बाधा आने का डर है।
9 सितंबर, 2026 तक भारतीय रुपया गिरकर 94.95 प्रति डॉलर के करीब पहुंच गया है। इसका सीधा असर हमारे इंपोर्ट बिल पर पड़ा है। अप्रैल से जुलाई के बीच भारत का इंपोर्ट बिल पिछले साल के $40.5 बिलियन से 56% उछलकर $63.4 बिलियन हो गया है।
कंपनियों पर क्या है दबाव?
शेयर बाजार के निवेशकों के लिए यह चिंता का विषय है। Indian Oil Corporation (IOCL), Bharat Petroleum (BPCL) और Hindustan Petroleum (HPCL) जैसी कंपनियों के मार्जिन पर गहरा असर पड़ रहा है। ये कंपनियां पेट्रोल और डीजल की बढ़ती लागत को रिटेल कीमतों में पूरी तरह नहीं जोड़ पा रही हैं। अगर यही हाल रहा, तो LPG पर होने वाला नुकसान (Under-recoveries) ₹200 प्रति सिलेंडर से भी ऊपर जा सकता है।
क्या है अपस्ट्रीम कंपनियों का हाल?
इसके उलट, Oil India जैसी अपस्ट्रीम कंपनियों के लिए यह स्थिति मुनाफे वाली हो सकती है क्योंकि उन्हें बाजार दर पर तेल बेचने का फायदा मिलता है। हालांकि, व्यापक बाजार जैसे Nifty 50 और Sensex में फिलहाल सावधानी का माहौल है। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि अगर क्रूड $90 के ऊपर बना रहा, तो चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) जीडीपी का 1.7% तक पहुंच सकता है।
