जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (GSI) ने क्रिटिकल मिनरल्स के खनन के लिए एडवांस्ड प्रोसेसिंग नॉलेज की कमी को एक बड़ी बाधा बताया है। यह चुनौती निवेशकों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और ग्रीन एनर्जी के लिए लिथियम और कोबाल्ट जैसे महत्वपूर्ण खनिजों को सुरक्षित करने का लक्ष्य रख रहा है।
क्या हुआ?
जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (GSI) ने देश की क्रिटिकल मिनरल्स सेक्टर की महत्वाकांक्षाओं के रास्ते में एक बड़ी रुकावट की पहचान की है। GSI के डायरेक्टर जनरल, असित साहा ने कहा कि भारत में इन खनिजों को प्रभावी ढंग से प्रोसेस करने के लिए इंडस्ट्री-स्केल की तकनीकी विशेषज्ञता की कमी है। जहां भारत आयरन ओर, कोयला और बॉक्साइट जैसे बल्क कमोडिटी के खनन में मजबूत ट्रैक रिकॉर्ड रखता है, वहीं यह देश नई पीढ़ी के खनिजों को संभालने के शुरुआती चरणों में है, जो आधुनिक तकनीक और हरित ऊर्जा के लिए आवश्यक हैं।
नॉलेज गैप की चुनौती
समस्या का मूल पारंपरिक बल्क माइनिंग और लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (rare earth elements) जैसे क्रिटिकल मिनरल्स के एक्सट्रैक्शन के बीच का अंतर है। बल्क माइनिंग में अक्सर बड़े, लंबे समय तक चलने वाले प्रोजेक्ट्स शामिल होते हैं जो दशकों तक चल सकते हैं। इसके विपरीत, क्रिटिकल मिनरल्स अक्सर छोटी, अधिक जटिल डिपॉजिट में पाए जाते हैं जिनके लिए विशेष तकनीक और अलग एक्सट्रैक्शन रणनीतियों की आवश्यकता होती है। GSI ने बताया कि इंडस्ट्री को इन हाई-वैल्यू रिसोर्सेज को रिफाइन करने के लिए आवश्यक विशिष्ट क्षमताओं को बनाने के लिए पारंपरिक बल्क माइनिंग मानसिकता से आगे बढ़ना होगा।
एनर्जी ट्रांज़िशन के लिए क्यों मायने रखता है?
क्रिटिकल मिनरल्स को अब रणनीतिक राष्ट्रीय संपत्ति माना जाता है। जैसे-जैसे भारत इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV), नवीकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक ग्लोबल हब बनने की ओर बढ़ रहा है, इन खनिजों की मांग तेजी से बढ़ रही है। एक्सप्लोरेशन और एडवांस्ड प्रोसेसिंग सहित एक डोमेस्टिक सप्लाई चेन के बिना, देश आयात पर बहुत अधिक निर्भर रहता है। यह निर्भरता सप्लाई चेन के जोखिम पैदा कर सकती है और उद्योगों को ग्लोबल मार्केट में प्राइस वोलेटिलिटी के प्रति संवेदनशील बना सकती है।
कंपनियां और सरकार कैसे प्रतिक्रिया दे रही हैं?
सरकार ने इस दिशा में कदम उठाए हैं, विशेष रूप से तीन सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों: NALCO, हिंदुस्तान कॉपर और मिनरल एक्सप्लोरेशन एंड कंसल्टेंसी लिमिटेड (MECL) के संयुक्त उद्यम खानिज विदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL) की स्थापना के माध्यम से। KABIL को विशेष रूप से घरेलू जरूरतों के लिए सप्लाई सुरक्षित करने हेतु विदेशों में क्रिटिकल मिनरल एसेट्स का अधिग्रहण करने के लिए स्थापित किया गया था। इसके अतिरिक्त, खान मंत्रालय इन गहरे दबे खनिजों के एक्सप्लोरेशन में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए विधायी परिवर्तनों को बढ़ावा दे रहा है, जो स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय खनन विशेषज्ञता दोनों को आकर्षित करने के लिए एक प्रतिस्पर्धी नीलामी मॉडल की ओर बढ़ रहा है।
जोखिम और कार्यान्वयन बाधाएं
निवेशकों के लिए, टाइमलाइन एक महत्वपूर्ण कारक है। एक डोमेस्टिक क्रिटिकल मिनरल्स इकोसिस्टम का निर्माण कोई त्वरित समाधान नहीं है। इसमें महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं, जिनमें प्रोसेसिंग प्लांट्स के लिए उच्च पूंजी व्यय की आवश्यकता और प्रोप्राइटरी टेक्नोलॉजी की सोर्सिंग शामिल है। इसके अलावा, खनन परियोजनाओं को अक्सर पर्यावरण मंजूरी और भूमि अधिग्रहण के लिए लंबी टाइमलाइन का सामना करना पड़ता है। यदि उद्योग जल्दी से टेक्नोलॉजी गैप को पाट नहीं पाता है, तो भारत में EV या हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स का निर्माण करने वाली कंपनियों को उच्च इनपुट लागत या सप्लाई में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
निवेशकों को KABIL जैसे संयुक्त उद्यमों की प्रगति और मिनरल प्रोसेसिंग में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को प्रोत्साहित करने वाली किसी भी नई नीति की निगरानी करनी चाहिए। डोमेस्टिक एक्सप्लोरेशन की गति और निजी खिलाड़ियों को खनन ब्लॉक का आवंटन इस बात का महत्वपूर्ण संकेतक होगा कि सेक्टर कितनी तेजी से परिपक्व हो रहा है। इसके अतिरिक्त, जब तक डोमेस्टिक प्रोडक्शन औद्योगिक मांग को पूरा नहीं कर लेता, तब तक इन खनिजों के लिए आयात पहुंच सुरक्षित करने वाले व्यापार समझौतों पर अपडेट प्रासंगिक होंगे। डोमेस्टिक माइनिंग फर्मों की पारंपरिक बल्क कमोडिटीज से विशेष क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग में सफलतापूर्वक बदलाव करने की क्षमता सेक्टर के लिए एक प्रमुख प्रदर्शन संकेतक (key performance indicator) होगी।
