इंडियन फेडरेशन ऑफ ग्रीन एनर्जी (IFGE) ने साफ कर दिया है कि भारत को क्लीन ट्रांसपोर्ट की ओर बढ़ने के लिए सिर्फ इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि इथेनॉल जैसे बायोफ्यूल का भी इस्तेमाल करना चाहिए। उनका मानना है कि यह एक मिश्रित रणनीति अपनाकर ही हम मौजूदा ईंधन की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं और कार्बन उत्सर्जन को कम कर सकते हैं।
इथेनॉल और EV का डबल इंजन
IFGE ने इस बात पर जोर दिया है कि भारत के ट्रांसपोर्ट सेक्टर को क्लीन बनाने का रास्ता सिर्फ इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) या सिर्फ बायोफ्यूल से नहीं निकलेगा, बल्कि दोनों के तालमेल से ही संभव है। संगठन इथेनॉल, हाइब्रिड, EVs और हाइड्रोजन जैसे विभिन्न तकनीकों के मिश्रण की वकालत कर रहा है। उनका मानना है कि यह एक मिक्स्ड स्ट्रेटेजी ही देश के विशाल ट्रांसपोर्ट सेक्टर को मैनेज करने और आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने का एकमात्र व्यावहारिक तरीका है।
E20 पेट्रोल का इम्पोर्ट बिल पर असर
भारत की एनर्जी स्ट्रेटेजी में इथेनॉल एक अहम हिस्सा बन गया है, खासकर अप्रैल 2025 तक लागू होने वाले देशव्यापी E20 पेट्रोल प्रोग्राम के साथ। इस प्रोग्राम के तहत पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिलाया जाएगा। जहां यह आयात बिल को कम करने में मदद करता है, वहीं इसका एक टेक्निकल पहलू भी है। ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI), इंडियन ऑयल और सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) के शोध बताते हैं कि E20 फ्यूल, E10 की तुलना में फ्यूल एफिशिएंसी में 2-6% की कमी ला सकता है। हालांकि, इंडस्ट्री बॉडी का कहना है कि इससे बड़े पैमाने पर इंजन खराब होने की शिकायतें नहीं आई हैं, और नए वाहन तेजी से ऐसे मटीरियल से बनाए जा रहे हैं जो इथेनॉल के ज्यादा मिश्रण को संभालने में सक्षम हैं।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
IFGE के इस रुख से ऑटो और एनर्जी सेक्टर में निवेश करने वाले निवेशकों को एक अहम संकेत मिलता है। ऑटो कंपनियां जो फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स (जो इथेनॉल और पेट्रोल के अलग-अलग मिश्रण पर चल सकते हैं) बना रही हैं, वे भी एनर्जी ट्रांजिशन के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी कि सिर्फ EV पर फोकस करने वाली कंपनियां।
चीनी और डिस्टिलरी सेक्टर की कंपनियां, जो इथेनॉल का उत्पादन करती हैं, और फ्लेक्स-फ्यूल इंजन के पुर्जे बनाने वाले ऑटो कंपोनेंट निर्माता, इस इकोसिस्टम का अहम हिस्सा बने रहेंगे। निवेशकों को उन कंपनियों के बीच अंतर समझने की जरूरत होगी जो पूरी तरह से EV ट्रांजिशन पर निर्भर हैं और वे जो ग्रीन एनर्जी शिफ्ट में खुद को डाइवर्सिफाइड खिलाड़ी के तौर पर पेश कर रही हैं। सिर्फ एक 'वन-साइज़-फिट्स-ऑल' अप्रोच अपनाने से हाइब्रिड और बायो-फ्यूल के रास्ते में छिपे वैल्यू को नजरअंदाज किया जा सकता है।
सेक्टर के रिस्क और फंड की हकीकत
क्लीन एनर्जी की ओर बढ़ना अपने आप में बड़े फाइनेंशियल और ऑपरेशनल चैलेंज लेकर आता है। इस ट्रांजिशन का एक बड़ा कंसर्न कैपिटल-इंटेंसिव नेचर है। दूसरी पीढ़ी के इथेनॉल उत्पादन, बड़े EV चार्जिंग नेटवर्क और हाइड्रोजन प्रोजेक्ट्स के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में अरबों के फंड की जरूरत होगी। इससे कंपनी की प्रॉफिटेबिलिटी, डेट मार्केट की स्थिरता और सरकारी इंसेंटिव पर निर्भरता बढ़ जाती है। इसके अलावा, जब तक ये वैकल्पिक एनर्जी सोर्स बड़े पैमाने पर उपलब्ध नहीं हो जाते, भारत जियोपॉलिटिकल झटकों और ग्लोबल कच्चे तेल के इंपोर्ट की कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बना रहेगा। निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां भारी कैपिटल खर्च को मैनेज करते हुए स्वस्थ प्रॉफिट मार्जिन कैसे बनाए रखती हैं, क्योंकि इंफ्रास्ट्रक्चर रोलआउट में कोई भी देरी या पॉलिसी सपोर्ट में बदलाव फाइनेंशियल परफॉर्मेंस पर दबाव डाल सकता है।
