कैंसर की दवाओं की किल्लत जारी: प्लैटिनम की बढ़ती कीमतें और इंपोर्ट में देरी बन रहे रोड़ा

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
कैंसर की दवाओं की किल्लत जारी: प्लैटिनम की बढ़ती कीमतें और इंपोर्ट में देरी बन रहे रोड़ा

भारत में सिस्प्लैटिन (cisplatin) और कार्बोप्लैटिन (carboplatin) जैसी ज़रूरी कैंसर की दवाओं की कमी बनी हुई है। प्लैटिनम की बढ़ती कीमतों और इंपोर्ट में देरी इस समस्या की जड़ हैं। NPPA ने जून में कीमतें 50% बढ़ाई थीं, लेकिन सप्लाई में कमी मरीजों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है।

क्या हैं वजहें?

भारत भर में कैंसर के मरीज़ सिस्प्लैटिन (cisplatin) और कार्बोप्लैटिन (carboplatin) जैसी ज़रूरी कीमोथेरेपी दवाओं को पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सरकारी कोशिशों के बावजूद, कई जगहों पर फार्मेसी और अस्पतालों में इन दवाओं की सप्लाई रुक-रुक कर हो रही है। इससे मरीज़ों को या तो दूसरे शहरों में इलाज के लिए भटकना पड़ रहा है या फिर अपने इलाज के साइकिल में देरी का सामना करना पड़ रहा है।

इस कमी के पीछे ग्लोबल सप्लाई चेन में आई रुकावटें और कमोडिटी (commodity) की कीमतों में आया भारी उछाल है। इन दवाओं को बनाने में इस्तेमाल होने वाला प्लैटिनम (platinum), जो एक मुख्य कच्चा माल है, उसकी कीमत आसमान छू रही है। वहीं, वेस्ट एशिया, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के पास शिपिंग में आई दिक्कतें इंपोर्टेड रॉ मटेरियल (imported raw material) के आने की रफ्तार को धीमा कर रही हैं।

प्राइस कंट्रोल का मैन्युफैक्चरिंग पर असर

ये कीमोथेरेपी दवाएं नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स (National List of Essential Medicines) और ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) के तहत सख्त प्राइस कंट्रोल (price control) में आती हैं। इस नियम के तहत, इन दवाओं को एक तय मैक्सिमम कीमत पर ही बेचा जा सकता है। जब इंपोर्टेड प्लैटिनम की कीमत तेजी से बढ़ी, तो कई दवा निर्माताओं के लिए प्रोडक्शन कॉस्ट (production cost) सरकार द्वारा तय की गई प्राइस कैप (price cap) से ऊपर चली गई। नतीजा यह हुआ कि कंपनियों के लिए उत्पादन करना आर्थिक रूप से संभव नहीं रहा, और उन्होंने घाटे से बचने के लिए उत्पादन कम कर दिया या रोक दिया।

इस समस्या को हल करने के लिए, नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) ने 12 जून, 2026 को इन ज़रूरी दवाओं की सीलिंग प्राइस (ceiling price) में अस्थायी रूप से 50% की बढ़ोतरी को मंज़ूरी दी। इसका मकसद उत्पादन को फिर से मुनाफे वाला बनाना और निर्माताओं को सप्लाई बहाल करने के लिए प्रोत्साहित करना था।

निवेशकों और सेक्टर के लिए क्या मायने?

यह स्थिति उन फार्मा (pharma) कंपनियों के लिए एक बड़ा ऑपरेशनल रिस्क (operational risk) पैदा करती है जो इंपोर्टेड कमोडिटी पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं। जब रॉ मटेरियल की कीमतें बढ़ती हैं, तो प्राइस-कंट्रोल्ड (price-controlled) ज़रूरी दवाओं के निर्माताओं के सामने एक तरफ ऊंचे इनपुट कॉस्ट (input cost) और दूसरी तरफ फिक्स्ड रेवेन्यू सीलिंग (fixed revenue ceiling) का दबाव आ जाता है। हालांकि, हालिया प्राइस हाइक (price hike) से कुछ राहत मिली है, लेकिन अगस्त के अंत तक भी कमी जारी रहने से यह लगता है कि सप्लाई चेन (supply chain) और प्रोडक्शन लैग (production lag) को सामान्य होने में समय लगेगा।

निवेशकों और इंडस्ट्री पर नज़र रखने वालों के लिए, सबसे अहम बात रॉ मटेरियल की सप्लाई की स्थिरता और मांग को पूरा करने के लिए निर्माताओं की उत्पादन बढ़ाने की रफ्तार पर नज़र रखना होगा। यह संकट दिखाता है कि कैसे भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tensions) और कमोडिटी मार्केट की अस्थिरता (commodity market volatility) जान बचाने वाली दवाओं की उपलब्धता को तुरंत प्रभावित कर सकती है, जिससे निर्माताओं के वॉल्यूम ग्रोथ (volume growth) और प्रॉफिट मार्जिन (profit margin) पर असर पड़ सकता है, जब तक कि उत्पादन पूरी तरह से ठीक न हो जाए।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.