भारत का एल्युमीनियम एक्सट्रूजन (Aluminium Extrusion) सेक्टर भारी वित्तीय संकट से जूझ रहा है। फैक्ट्रियों में कामकाज घटकर केवल **30%** रह गया है, जिसके चलते मैन्युफैक्चरर्स सरकार से इंपोर्ट ड्यूटी में राहत की मांग कर रहे हैं।
उत्पादन में बड़ी गिरावट
भारतीय एल्युमीनियम एक्सट्रूजन इंडस्ट्री इस समय गंभीर मंदी की चपेट में है। पिछले कुछ समय में उत्पादन का आंकड़ा 12 लाख टन से गिरकर 8 से 9 लाख टन के बीच आ गया है। कुल इंस्टॉल्ड कैपेसिटी 30 लाख टन होने के बावजूद, मौजूदा यूटिलाइजेशन रेट केवल 27% से 30% है। मशीनों के खाली बैठने के कारण कंपनियों पर फिक्स्ड कॉस्ट का बोझ बढ़ गया है, जिससे कर्ज में डूबी कई कंपनियां अपनी संपत्ति बैंकों को सौंपने की कगार पर हैं।
ड्यूटी स्ट्रक्चर बना गले की फांस
मैन्युफैक्चरर्स की मुख्य नाराजगी सरकार की टैक्स नीति को लेकर है। 7.5% बेसिक कस्टम ड्यूटी और उस पर 10% सोशल वेलफेयर सरचार्ज के चलते प्राइमरी एल्युमीनियम पर 8.25% का भारी टैक्स लग रहा है। इसका नतीजा यह है कि बाहर से आने वाले तैयार माल (Finished goods) सस्ते पड़ रहे हैं और देश के भीतर बना माल महंगा। हैरानी की बात यह है कि देश में इंपोर्ट 16 लाख टन तक पहुंच गया है, जो घरेलू उत्पादन से लगभग दोगुना है।
ग्लोबल महंगाई और अन्य चुनौतियां
इंडस्ट्री केवल टैक्स की मार ही नहीं झेल रही, बल्कि ग्लोबल मार्केट में बढ़ी कीमतों ने भी इसे पस्त कर दिया है। लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) पर कीमतें $2,200 प्रति टन से बढ़कर $3,700 के पार पहुंच गई हैं। इसके अलावा पिछले एक क्वार्टर में इनपुट कॉस्ट में 20% से 35% का इजाफा हुआ है, जिसे छोटी कंपनियां ग्राहकों पर नहीं डाल पा रही हैं।
कहां दिखेगा असर?
इस संकट का सीधा असर ऑटोमोबाइल, कंस्ट्रक्शन और पावर ट्रांसमिशन जैसे अहम सेक्टरों पर पड़ रहा है। यदि हालात नहीं सुधरे, तो इन सेक्टरों में सप्लाई चेन ठप हो सकती है। पिछले एक साल में सेक्टर से लगभग 30% नौकरियां खत्म हो चुकी हैं। राजकोट, अहमदाबाद और वडोदरा जैसे इंडस्ट्रियल हब में वर्किंग कैपिटल की भारी कमी देखी जा रही है। अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या सरकार ड्यूटी स्ट्रक्चर में कोई बदलाव कर इन कंपनियों को राहत देती है या नहीं।
