भारत ने गोल्ड रिफाइनिंग में अपनी क्षमता को बढ़ाकर **1,800 टन** कर लिया है, लेकिन असल में केवल **293 टन** का ही काम हो पा रहा है। इस सुस्ती के पीछे रेगुलेटरी अड़चनें, बदलती इम्पोर्ट ड्यूटी और इंटरनेशनल सर्टिफिकेशन की कमी मुख्य कारण हैं।
भारत ने पिछले एक दशक में वर्ल्ड-क्लास गोल्ड रिफाइनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया है, लेकिन आज यह सेक्टर एक बड़े संकट से गुजर रहा है। साल 2013 में जहां हमारी क्षमता सिर्फ 300 टन थी, वहीं 2021 तक यह बढ़कर 1,800 टन हो गई। हालांकि, मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि सालाना काम सिर्फ 293 टन के आसपास ही सिमटा हुआ है।
सर्टिफिकेशन का बड़ा पेंच
भारतीय रिफाइनर्स के लिए सबसे बड़ी बाधा इंटरनेशनल सर्टिफिकेशन की कमी है। ग्लोबल ट्रेड के लिए London Bullion Market Association (LBMA) की 'गुड डिलीवरी लिस्ट' अनिवार्य है, जिसमें भारत की केवल एक कंपनी MMTC-PAMP शामिल है। तुलना करें तो चीन में 16 और जापान में 11 ऐसी रिफाइनरियां हैं। IIM अहमदाबाद की रिसर्च के मुताबिक, भारतीय कंपनियां इंटरनेशनल मानकों, जैसे सप्लाई-चेन ट्रेसिबिलिटी और एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग प्रोटोकॉल को पूरा करने में संघर्ष कर रही हैं।
ट्रेड पॉलिसी में अस्थिरता
इंडस्ट्री के सामने एक और बड़ी चुनौती सरकार की अस्थिर ट्रेड पॉलिसी है। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में गोल्ड एक्सपोर्ट में 73.5% की भारी गिरावट दर्ज की गई। बार-बार बदलती इम्पोर्ट ड्यूटी की वजह से वर्किंग कैपिटल पर दबाव बढ़ जाता है, जिससे फॉर्मल रिफाइनर्स के लिए तस्करी (Smuggling) करने वालों से मुकाबला करना मुश्किल हो जाता है। जानकारों का कहना है कि अगर 'डोरे' (Doré) इंपोर्ट पर स्टेबल ड्यूटी-क्रेडिट सिस्टम लागू हो, तो स्थिति में सुधार हो सकता है।
IIBX से उम्मीदें
GIFT सिटी स्थित India International Bullion Exchange (IIBX) को इस सेक्टर का भविष्य माना जा रहा है। अभी यह एक्सचेंज मुख्य रूप से इंपोर्ट पर केंद्रित है, लेकिन अगर भारत को 2030 तक ग्लोबल बुलियन हब बनना है, तो इसे बैंकों और इंटरनेशनल प्लेयर्स के बीच एक मजबूत कड़ी के रूप में काम करना होगा। निवेशकों के लिए अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार कब तक घरेलू नियमों को ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के साथ अलाइन करती है और ड्यूटी में होने वाले उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करती है।
