होलसेल मार्केट में चीनी की कीमतें हालिया **₹67** प्रति किलो के शिखर से गिरकर **₹47** प्रति किलो पर आ गई हैं। सरकार द्वारा सप्लाई चेन को सामान्य करने के लिए उठाए गए सख्त कदमों के बाद आई इस गिरावट से शुगर कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बन सकता है।
बाजार में क्यों आई गिरावट?
अगस्त के मध्य में चीनी की कीमतें ₹67 प्रति किलो के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थीं, लेकिन सरकारी दखल ने पूरा समीकरण बदल दिया है। सरकार ने महंगाई पर लगाम लगाने के लिए एक्सपोर्ट के लिए तय की गई करीब 3.5 लाख टन रिफाइंड चीनी को घरेलू बाजार की ओर मोड़ दिया है। साथ ही, 1 सितंबर से एक नया नियम लागू किया गया है, जिसके तहत 10 टन से ज्यादा खपत करने वाले बल्क कंज्यूमर्स को अपना स्टॉक 15 दिन से ज्यादा के लिए जमा रखने पर रोक लगा दी गई है। इस कदम का मकसद जमाखोरी रोकना और बाजार में तुरंत सप्लाई बढ़ाना है।
शुगर कंपनियों के लिए चुनौती
कीमतों में इस तेज गिरावट का सीधा असर चीनी मिलों की प्रॉफिटेबिलिटी पर पड़ना तय है। जहां 2025-26 के मार्केटिंग ईयर में 306 लाख टन उत्पादन का अनुमान है, वहीं घरेलू डिमांड 280 से 285 लाख टन के बीच रहने की उम्मीद है। सप्लाई की स्थिति तो ठीक है, लेकिन सरकारी पॉलिसी के चलते कंपनियों का रेवेन्यू आउटलुक प्रभावित हुआ है।
क्या रिटेल में सस्ती होगी चीनी?
होलसेल मार्केट के उलट, अभी रिटेल कीमतों में उतनी बड़ी गिरावट नहीं दिखी है। दुकानदार अभी भी पुराने ऊंचे भाव वाले स्टॉक को क्लियर कर रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से रिटेल बाजार को होलसेल कीमतों के अनुकूल होने में करीब 10 दिन का समय लगता है। निवेशकों को अब यह देखना होगा कि क्या यह गिरावट जल्द ही आम उपभोक्ताओं की जेब को राहत देती है या नहीं।
