सरकार ने साल 2026/27 के लिए इथेनॉल (Ethanol) में गन्ने के रस और सिरप के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगा दी है। इस फैसले से शुगर मिलों की कमाई पर बड़ा असर पड़ सकता है और बाजार में चीनी की सप्लाई बढ़ने की चिंता ने निवेशकों की नींद उड़ा दी है।
भारत सरकार ने एक नया निर्देश जारी किया है, जिसके तहत ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को साल 2026/27 के इथेनॉल सप्लाई ईयर के लिए गन्ने के रस, शुगर सिरप और बी-हेवी मोलासेस से बने इथेनॉल को शामिल करने से मना कर दिया गया है। यह पॉलिसी शुगर मिलों के उस बिजनेस मॉडल के लिए बड़ा झटका है, जिसके जरिए वे पिछले कुछ सालों से इथेनॉल बनाकर भारी मुनाफा कमा रही थीं।
निवेशकों की चिंता क्यों बढ़ी?
अब तक शुगर मिलें गन्ने को चीनी के साथ-साथ इथेनॉल में बदलकर दोहरा लाभ कमा रही थीं। इथेनॉल न केवल हाई-मार्जिन वाला बिजनेस था, बल्कि यह चीनी के सरप्लस स्टॉक को मैनेज करने का भी एक जरिया था। अब सरकार के इस आदेश के बाद कंपनियों को वापस पूरी तरह से चीनी की बिक्री पर निर्भर रहना पड़ेगा।
सप्लाई बढ़ने का डर
बाजार को सबसे ज्यादा डर इस बात का है कि यदि मिलें इथेनॉल नहीं बनाएंगी, तो वे गन्ने का इस्तेमाल चीनी उत्पादन में ही करेंगी। इससे घरेलू बाजार में चीनी की सप्लाई बढ़ेगी, जिससे कीमतों में गिरावट आ सकती है। Shree Renuka Sugars और Dhampur Sugar Mills जैसी कंपनियों के लिए यह स्थिति मुनाफे पर दबाव बना सकती है, क्योंकि वे कमोडिटी की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव के प्रति फिर से संवेदनशील हो जाएंगी।
अब आगे क्या?
इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम ने अब तक शुगर सेक्टर को स्थिरता दी थी और कंपनियों का कर्ज कम करने में मदद की थी। अब यह सेक्टर एक बार फिर पारंपरिक और अस्थिर मॉडल की ओर लौट रहा है। निवेशकों को अब चीनी की घरेलू कीमतों पर पैनी नजर रखने की जरूरत है, क्योंकि कोई भी बड़ी गिरावट सीधे कंपनियों के मार्जिन को चोट पहुंचाएगी। साथ ही, कंपनियों के आने वाले क्वाटरली नतीजे और सरकार की भविष्य की नीतियों पर भी बाजार की निगाहें टिकी रहेंगी।
