होलसेल मार्केट में चीनी की कीमतों में **20%** की भारी गिरावट दर्ज की गई है। सरकार ने सप्लाई बढ़ाने के लिए **10 लाख टन** चीनी के ड्यूटी-फ्री इम्पोर्ट और एक्सपोर्ट को डायवर्ट करने का बड़ा फैसला लिया है।
त्योहारी सीजन से पहले देश में चीनी की कीमतों को काबू करने के लिए सरकार ने कड़े कदम उठाए हैं। पिछले 10 दिनों के भीतर एक्स-मिल चीनी के दाम में 20% तक की कमी आई है। यह गिरावट उस दौर के बाद आई है जब जमाखोरी के कारण कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी देखी जा रही थी।
बाजार को कैसे मिली राहत?
सरकार ने बाजार में सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए एक्सपोर्ट के लिए तय 3 से 3.5 लाख टन रिफाइंड चीनी को घरेलू बाजार में उतारने की अनुमति दे दी है। इसके अलावा, 31 अक्टूबर 2026 तक 10 लाख टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री इम्पोर्ट (Tariff Rate Quota के तहत) को मंजूरी दी गई है। इन फैसलों का मुख्य उद्देश्य बफर स्टॉक को बनाए रखना है।
शुगर मिलों के मार्जिन पर दबाव
आम आदमी के लिए राहत की बात है, लेकिन चीनी बनाने वाली कंपनियों के लिए चुनौतियां बढ़ सकती हैं। 2026-27 सीजन के लिए गन्ने का FRP ₹365 प्रति क्विंटल तय किया गया है। जब एक्स-मिल कीमतें गिरती हैं, तो मिलों की कमाई पर दबाव पड़ता है क्योंकि कच्चा माल (गन्ना) खरीदना महंगा बना हुआ है। निवेशकों को यह देखना होगा कि क्या कंपनियां इस दौर में भी अपना प्रॉफिट मार्जिन बरकरार रख पाएंगी।
नए नियमों की लगाम
कीमतों में हेरफेर रोकने के लिए सरकार ने स्टॉक लिमिट पर भी सख्ती की है। 1 सितंबर से 30 नवंबर 2026 तक थोक उपभोक्ताओं (Bulk Consumers) के लिए स्टॉक लिमिट को 15 दिन तक सीमित कर दिया गया है।
अब आगे क्या?
फिलहाल खुदरा बाजार में चीनी ₹65 प्रति किलो के आसपास बनी हुई है, जो अभी तक होलसेल की 20% गिरावट को पूरी तरह रिफ्लेक्ट नहीं कर रही है। आने वाले समय में यह देखना होगा कि होलसेल की यह कटौती आम ग्राहकों तक कितनी तेजी से पहुंचती है। साथ ही, 2026-27 के फसल चक्र और मानसून पर भी नजर रखना जरूरी होगा, क्योंकि किसी भी तरह की सप्लाई बाधा फिर से कीमतों में आग लगा सकती है।
