शुगर इंडस्ट्री ने हालिया मुनाफाखोरी के दावों को सिरे से खारिज किया है। मिलों का कहना है कि कीमतों में उछाल सिर्फ अस्थायी था और इसने कुल सालाना सप्लाई के महज **2.5%** हिस्से को ही प्रभावित किया।
शुगर इंडस्ट्री से जुड़े संगठनों ने हालिया उन दावों का कड़ा विरोध किया है जिनमें कहा गया था कि अगस्त 2026 के अंत में आई बाजार में अस्थिरता के दौरान शुगर मिलों ने भारी मुनाफा कमाया। इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन और नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज ने स्पष्ट किया है कि यह तेजी पूरी तरह से स्थानीय और अल्पकालिक थी। सितंबर के अंत तक, एक्स-मिल कीमतें ₹4,450 प्रति क्विंटल के पास आ गई हैं, जो पिछले महीने के पीक से काफी नीचे है।\n\n### मार्केट में सुधार का असर\nबाजार में सप्लाई सामान्य होने के बाद रिटेल कीमतों में 11% से 12% तक की गिरावट दर्ज की गई है और चीनी अब ₹57.5 प्रति किलो के भाव पर है। यह हालिया उच्चतम स्तर से करीब 30% की कमी है, जो यह दर्शाता है कि अस्थायी मांग-आपूर्ति का असंतुलन अब खत्म हो चुका है।\n\n### क्या सच में हुई मुनाफाखोरी?\nइंडस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, 17 अगस्त से 31 अगस्त के बीच केवल 7.22 लाख टन चीनी ही ₹4,996.98 प्रति क्विंटल की औसत दर पर बेची गई। अगर इसकी तुलना भारत की 285 लाख टन की सालाना खपत से करें, तो यह कुल बाजार का महज 2.5% है। बाकी 97.5% माल काफी कम कीमतों पर बेचा गया।\n\n### बढ़ती लागत का बोझ\nशुगर मिलों के लिए असली चुनौती लागत प्रबंधन की है। 2025-26 शुगर सीजन की शुरुआत से ही पैन-इंडिया औसत एक्स-मिल रियलाइजेशन लगभग ₹4,100 प्रति क्विंटल रहा है। मिलों ने अब तक किसानों को गन्ना खरीद के लिए ₹1.12 लाख करोड़ का भुगतान किया है, जो इस सीजन की कुल देय राशि का 97% है। भविष्य में मुनाफा इस बात पर निर्भर करेगा कि त्योहारी मांग और कच्चे माल की ऊंची कीमतों के बीच कंपनियां बैलेंस कैसे बनाती हैं।
