भारत में स्टील की कीमतें पिछले **4 साल** के हाई लेवल पर पहुंच गई हैं। इसकी मुख्य वजह कोकिंग कोल (Coking Coal) की बढ़ती लागत है। निवेशकों के लिए अब बड़ा सवाल यह है कि क्या कंपनियां इस बढ़े हुए बोझ को ग्राहकों पर डाल पाएंगी या इसका असर उनके मुनाफे पर पड़ेगा?
भारत में स्टील की कीमतें मिड-2022 के बाद अब अपने सबसे ऊंचे स्तर पर हैं। फिलहाल हॉट रोल्ड कॉइल्स (HRC) ₹64,000 प्रति टन और कोल्ड रोल्ड कॉइल्स (CRC) ₹75,000 प्रति टन के भाव पर ट्रेड कर रहे हैं। अगस्त की शुरुआत में ये कीमतें क्रमशः ₹58,000 और ₹66,500 थीं, यानी महज कुछ हफ्तों में बड़ी उछाल आई है।
कोकिंग कोल की महंगाई का दबाव
इस तेजी के पीछे सबसे बड़ा कारण ग्लोबल मार्केट में कोकिंग कोल की अस्थिरता है। स्टील प्रोडक्शन के लिए जरूरी यह कच्चा माल एक महीने में $65 महंगा होकर $305 प्रति टन पर पहुंच गया है। Tata Steel, JSW Steel, SAIL और Jindal Steel & Power जैसी कंपनियों के लिए कोकिंग कोल कुल प्रोडक्शन लागत का 30% से ज्यादा हिस्सा रखता है, जिससे ऑपरेटिंग मार्जिन पर तुरंत दबाव बन गया है।
डिमांड और असर
हालांकि, घरेलू स्तर पर खपत में मजबूती है। फाइनेंशियल ईयर की अप्रैल से अगस्त अवधि में स्टील की खपत 7% बढ़कर 70 मिलियन टन रही है। इंफ्रास्ट्रक्चर और कंस्ट्रक्शन सेक्टर से आ रही मांग ने इसे सहारा दिया है, जो भारत की कुल स्टील मांग का करीब 60% हिस्सा कवर करते हैं। ऑटोमोबाइल सेक्टर में भी डिमांड स्थिर बनी हुई है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
निवेशकों को अब यह देखना होगा कि कंपनियां अपनी बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों से कितनी आसानी से वसूल कर पाती हैं। अगर कीमतें ज्यादा बढ़ती हैं, तो ऑटो और कंस्ट्रक्शन सेक्टर की डिमांड सुस्त पड़ सकती है। इसके अलावा, एक बड़ा रिस्क 'सस्ते आयात' का भी है। अगर घरेलू स्टील इंटरनैशनल मार्केट से ज्यादा महंगा रहा, तो आयात बढ़ने से लोकल मैन्युफैक्चरर्स को अपनी कीमतें घटाने पर मजबूर होना पड़ सकता है। निवेशकों को आने वाले नतीजों में कंपनियों के मार्जिन पर खास नजर रखनी चाहिए।
