दरअसल, चांदी की कीमतों पर इस वक्त कई बड़े ग्लोबल और डोमेस्टिक फैक्टर्स का दबाव बना हुआ है। 18 मई, 2026 को एक ग्राम चांदी ₹272 और एक किलोग्राम ₹271,800 पर ट्रेड कर रही थी, जो 0.20% की मामूली बढ़त दिखाती है। लेकिन मार्केट का सेंटिमेंट अभी भी सतर्क बना हुआ है।
बाजार पर मुख्य रूप से मजबूत हो रहे अमेरिकी डॉलर और लगातार ऊंची बनी हुई तेल की कीमतों का असर दिख रहा है। इन वजहों से महंगाई (Inflation) की चिंताएं बढ़ रही हैं और निवेशक कमोडिटीज़ की बजाय बॉन्ड जैसे सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर जा रहे हैं। बाजार को उम्मीद है कि इस साल अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में कोई बड़ी कटौती नहीं करेगा, बल्कि कुछ एनालिस्ट्स (Analysts) तो दिसंबर तक एक और बढ़ोतरी की भी आशंका जता रहे हैं। अगर ऐसा होता है, तो चांदी जैसी नॉन-इंटरेस्ट बेयरिंग एसेट्स (Non-interest bearing assets) निवेशकों के लिए कम आकर्षक हो जाएंगी। पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical tensions) के कारण तेल की सप्लाई पर असर पड़ रहा है, जिससे तेल की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं और अप्रत्यक्ष रूप से कीमती धातुओं पर दबाव डाल रही हैं।
घरेलू मोर्चे पर, भारत सरकार ने हाल ही में इंपोर्ट ड्यूटी (Import Duty) में बढ़ोतरी के बाद चांदी के इंपोर्ट को 'फ्री' कैटेगरी से हटाकर 'रेस्ट्रिक्टेड' (Restricted) कैटेगरी में डाल दिया है। इस सख्ती का असर यह होगा कि मार्केट में चांदी की सप्लाई सीमित हो सकती है और कीमतें एक संकीर्ण दायरे में बनी रह सकती हैं, खासकर मजबूत डॉलर के चलते। भारत चांदी का एक बड़ा कंज्यूमर (Consumer) है, इसलिए डोमेस्टिक मार्केट इन कंट्रोल्स के प्रति काफी संवेदनशील है। पिछले हफ्ते चांदी की कीमतों में आई 12% की तेज गिरावट इस बात का संकेत देती है कि फिलहाल मार्केट में कमजोरी का माहौल है, भले ही आज मामूली रिकवरी देखी गई हो। 18 मई, 2026 को भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 83.50 पर था, जो डॉलर की मजबूती को दर्शाता है और भारतीय खरीदारों के लिए डॉलर-डिनोमिनेटेड (Dollar-denominated) कमोडिटीज़ को महंगा बना रहा है।
सरकार की इंपोर्ट पाबंदियां और बढ़ी हुई ड्यूटी फिजिकल मेटल (Physical Metal) के लिए बड़ी रुकावटें खड़ी कर रही हैं, जिससे डोमेस्टिक मार्केट ग्लोबल प्राइस डिस्कवरी (Global price discovery) से अलग हो सकती है। यह नीतिगत बदलाव कंज्यूमर डिमांड, खासकर भारत में चांदी की खपत के बड़े हिस्से वाले ज्वैलरी सेक्टर (Jewellery sector) पर इसके लंबे समय के असर को लेकर चिंताएं बढ़ाता है। चांदी को कमजोर होते रुपये और अमेरिकी फेडरल रिजर्व जैसी सेंट्रल बैंक्स की सख्त मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary policy) से भी खतरा है। वहीं, लंबी अवधि में सोलर एनर्जी सेक्टर (Solar energy sector) से आने वाली डिमांड चांदी की कीमतों को सहारा दे सकती है। ऐसे में, रिटेल निवेशकों (Retail investors) को अंतरराष्ट्रीय रुझानों, फेडरल रिजर्व की नीतियों और घरेलू रेगुलेटरी (Regulatory) बदलावों पर नजर रखने की सलाह दी जाती है। मौजूदा मार्केट कंडीशन के हिसाब से, कीमतों में सीमित दायरे में उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है।