Shrimp Industry: बढ़ती लागत और ग्लोबल कॉम्पिटिशन का दबाव, भारतीय झींगा उत्पादकों की मुनाफे पर कैंची

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Shrimp Industry: बढ़ती लागत और ग्लोबल कॉम्पिटिशन का दबाव, भारतीय झींगा उत्पादकों की मुनाफे पर कैंची

भारतीय झींगा (Shrimp) किसान और प्रोसेसर्स इन दिनों दोहरी मार झेल रहे हैं। एक तरफ फीड (चारा) की बढ़ती कीमतों ने लागत बढ़ा दी है, तो दूसरी तरफ इक्वाडोर जैसे देशों से ग्लोबल मार्केट में आ रही सप्लाई की बाढ़ ने भाव को थाम रखा है, जिससे मुनाफा लगातार घट रहा है।

भारतीय एक्वाकल्चर इंडस्ट्री इस समय एक कठिन दौर से गुजर रही है। किसानों और प्रोसेसिंग कंपनियों के लिए चुनौती यह है कि उनके उत्पादन की लागत तो आसमान छू रही है, लेकिन ग्लोबल मार्केट में झींगे के दाम स्थिर बने हुए हैं।

फीड की लागत का गणित

एक झींगा किसान के कुल खर्च का 50% से 60% हिस्सा सिर्फ फीड (चारे) पर खर्च होता है। हाल ही में फिशमील और सोयाबीन मील की कमी के कारण इसके दाम तेजी से बढ़े हैं। इस पर 'अल नीनो' (El Niño) जैसे ग्लोबल वेदर पैटर्न की भी मार पड़ी है। चारे में मामूली बढ़ोतरी भी सीधे तौर पर कंपनियों के नेट प्रॉफिट पर बड़ा असर डाल रही है।

ग्लोबल मार्केट की चुनौती

भारत के सामने सबसे बड़ी दिक्कत सप्लाई की है। इक्वाडोर जैसे देशों ने रिकॉर्ड स्तर पर प्रोडक्शन बढ़ा दिया है, जिससे इंटरनेशनल मार्केट में कीमतों में गिरावट आई है। भारतीय निर्यातकों को अपना मार्केट शेयर बचाने के लिए मजबूरन कम भाव पर माल बेचना पड़ रहा है, जिससे उनकी प्रॉफिटेबिलिटी पर सीधा असर दिख रहा है।

सप्लाई चेन पर असर

आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में छोटे किसान पहले ही खराब मौसम और बीमारियों के कारण आर्थिक तंगी झेल रहे हैं। लिस्टेड प्रोसेसिंग कंपनियों ने भी अपनी पिछली तिमाहियों के नतीजों में नेट प्रॉफिट में भारी गिरावट दिखाई है।

आगे की राह

अब निवेशकों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या चारे की कीमतों में स्थिरता आएगी और क्या ग्लोबल डिमांड सुधरेगी। फिलहाल, बायोलॉजिकल रिस्क और अनिश्चित मौसम के कारण सेक्टर के लिए माहौल चुनौतीपूर्ण बना हुआ है, जिससे कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बना रहने की आशंका है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.