भारत से चावल के एक्सपोर्ट प्राइसेस (Export Prices) में लगातार तीसरे हफ़्ते तेज़ी देखने को मिल रही है। 5% ब्रोकन पारबॉइल्ड राइस का भाव बढ़कर **$352-$357** प्रति टन हो गया है। सरकारी बिक्री के लिए तय की गई ऊंची रिजर्व प्राइस (Reserve Price) और मॉनसून की देरी से रोपाई में आई कमी इस तेज़ी की मुख्य वजह हैं।
जानिए क्या है दाम बढ़ने का कारण?
भारतीय चावल के एक्सपोर्ट रेट्स (Export Rates) लगातार तीन हफ़्तों से ऊपर जा रहे हैं। 5% ब्रोकन पारबॉइल्ड राइस का भाव पिछले हफ़्ते $348-$352 प्रति टन से बढ़कर अब $352-$357 प्रति टन पर पहुंच गया है। वहीं, 5% ब्रोकन वाली व्हाइट राइस की कीमत भी $353-$357 के दायरे में ही कारोबार कर रही है। सप्लाई में आई कमी ने ट्रेडर्स (Traders) और मार्केट पार्टिसिपेंट्स (Market Participants) का ध्यान खींचा है।
सरकारी पॉलिसी का असर
इस प्राइस हाइक (Price Hike) की सबसे बड़ी वजह सरकार की हालिया 'ओपन मार्केट सेल स्कीम' (Open Market Sale Scheme) है। सरकार ने बिक्री के लिए रिजर्व प्राइस (Reserve Price) को बढ़ा दिया है, जिससे खुले बाज़ार में कीमतें ट्रेडर्स की उम्मीद से ज़्यादा हो गई हैं। इस पॉलिसी का मकसद डोमेस्टिक सप्लाई (Domestic Supply) और डिमांड (Demand) को संतुलित करना है, लेकिन इसका सीधा असर भारतीय चावल की एक्सपोर्ट कॉस्ट (Export Cost) पर हुआ है।
मॉनसून की देरी और रोपाई का पिछड़ापन
सरकारी फैसलों के अलावा, मौसम भी चावल के कारोबार के लिए एक अहम फैक्टर बन गया है। मॉनसून की प्रगति कृषि क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इस बार गर्मियों में बोई जाने वाली धान की रोपाई (Planting) में देरी देखी जा रही है। 10 जुलाई तक, किसानों ने केवल 11.5 मिलियन हेक्टेयर ज़मीन पर ही रोपाई की है, जो पिछले साल की इसी अवधि के 12.6 मिलियन हेक्टेयर की तुलना में कम है। रोपाई में इस देरी और मॉनसून की अनियमितता ने आने वाले सीजन के कुल प्रोडक्शन (Production) को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है।
क्षेत्रीय मुकाबले की स्थिति
भारत की प्राइसिंग (Pricing) डायनामिक्स (Dynamics) क्षेत्रीय स्तर पर भी मायने रखती है। थाईलैंड में 5% ब्रोकन राइस की कीमतें थोड़ी नरम होकर $445-$450 प्रति टन हो गई हैं, जिसकी एक वजह फिलीपींस द्वारा इम्पोर्ट (Import) पर लगाई गई अस्थायी रोक है। वहीं, वियतनाम में कीमतें $445-$450 के दायरे में स्थिर हैं, क्योंकि वहां जुलाई के आखिर से अगस्त की शुरुआत तक पीक हार्वेस्ट (Peak Harvest) का समय है। भले ही भारत अभी भी इन बड़े एक्सपोर्टर्स (Exporters) की तुलना में ज़्यादा कॉम्पिटिटिव (Competitive) प्राइसिंग दे रहा है, लेकिन कीमतों का यह गैप (Gap) कम होना ग्लोबल फूड कमोडिटी (Food Commodity) ट्रेंड्स पर नज़र रखने वालों के लिए महत्वपूर्ण है।
जोखिम और आगे की राह
निवेशकों (Investors) को यह ध्यान रखना चाहिए कि राइस मार्केट (Rice Market) मौसम के उतार-चढ़ाव के प्रति बहुत संवेदनशील है। बांग्लादेश में आई बाढ़ से 28,000 हेक्टेयर से ज़्यादा की खेती प्रभावित हुई है, जो इस क्षेत्र में सप्लाई शॉक (Supply Shock) की संभावना को दर्शाता है। भारतीय बाज़ार के लिए, अगले कुछ हफ़्तों में धान की रोपाई की प्रगति देखना महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि रोपाई में लगातार कमी डोमेस्टिक सप्लाई (Domestic Supply) को और टाइट (Tight) कर सकती है। इसके अलावा, सरकारी दखलअंदाजी (Government Intervention) एक बड़ा फैक्टर बनी हुई है; ओपन मार्केट सेल स्कीम या एक्सपोर्ट पॉलिसी (Export Policy) में कोई भी भविष्य में बदलाव, एग्री ट्रेड (Agri Trade) और मिलिंग सेक्टर (Milling Sector) के प्लेयर्स के लिए प्राइस वोलेटिलिटी (Price Volatility) और मार्जिन (Margins) को काफी हद तक प्रभावित कर सकता है।
