त्योहारी सीजन से पहले देश में चीनी के खुदरा दाम **₹60** प्रति किलो के नीचे बने हुए हैं। सरकार ने जमाखोरी रोकने के लिए डीलरों के लिए स्टॉक लिमिट को घटाकर **2,000 क्विंटल** कर दिया है, जिसका असर शुगर मिलों के प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ सकता है।
सरकार का कड़ा रुख और नई पॉलिसी
14 सितंबर 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, लगातार चौथे दिन चीनी की औसत खुदरा कीमत ₹60 के स्तर से नीचे रही है। महंगाई को काबू में रखने के लिए सरकार ने ड्यूटी-फ्री रॉ शुगर इंपोर्ट की इजाजत दी है। इसके अलावा, 15 सितंबर 2026 से 30 नवंबर 2026 तक डीलरों के लिए स्टॉक लिमिट को 4,000 क्विंटल से घटाकर सीधे 2,000 क्विंटल कर दिया गया है।
क्षेत्रीय असंतुलन (Regional Disparity)
राष्ट्रीय औसत कीमत ₹59.57 प्रति किलो है, लेकिन राज्यों के हिसाब से स्थिति अलग है। महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े उत्पादक राज्यों में कीमतें नरम हुई हैं, जबकि आंध्र प्रदेश और केरल के दक्षिणी बाजारों में अभी भी दबाव बना हुआ है। यह स्पष्ट करता है कि लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन का प्रभाव कीमतों पर भारी है।
प्रोडक्शन का आउटलुक और रिस्क
2025-26 मार्केटिंग ईयर के लिए चीनी उत्पादन का अनुमान 343 लाख टन से घटाकर 306 लाख टन कर दिया गया है। देश की सालाना मांग 285 लाख टन के आसपास है, जिससे सप्लाई और डिमांड के बीच का अंतर कम हो रहा है।
निवेशकों के लिए चिंता की बात
शुगर मिलों के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ सरकार कीमतों पर लगाम लगाए हुए है, तो दूसरी तरफ उन्हें गन्ना किसानों को ऊंचे दाम चुकाने पड़ रहे हैं। अगर एक्स-मिल (Ex-mill) कीमतें और घटती हैं और इनपुट कॉस्ट (गन्ने का दाम) ज्यादा रहता है, तो आने वाली तिमाहियों में कंपनियों के मार्जिन पर भारी दबाव दिख सकता है। मार्केट एक्सपर्ट्स अब यह देख रहे हैं कि स्टॉक लिमिट की सख्ती सप्लाई चेन में कोई रुकावट पैदा करती है या नहीं।
