जुलाई 2026 में भारत से ऑयलमील (oilmeal) के निर्यात में **65%** की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। इसका मुख्य कारण घरेलू बाजार में सोयाबीन की ऊंची कीमतें हैं, जिससे भारतीय मील वैश्विक बाजार में पिछड़ गई है।
एक्सपोर्ट के आंकड़ों में भारी गिरावट
सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के डेटा के मुताबिक, जुलाई 2026 में ऑयलमील शिपमेंट में साल-दर-साल 65% की भारी गिरावट आई है। फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के पहले चार महीनों में कुल निर्यात 27% घटकर 11.05 लाख टन रह गया है, जो घरेलू प्रोडक्शन और इंटरनेशनल प्राइसिंग के बीच के बड़े अंतर को दर्शाता है।
क्यों नहीं बिक रहा भारतीय सोयामील?
भारतीय सोयामील की कीमत फिलहाल लगभग $613 प्रति टन है, जबकि अर्जेंटीना और ब्राजील जैसे दक्षिण अमेरिकी देश इसे $428 प्रति टन के भाव पर उपलब्ध करा रहे हैं। इस प्राइस गैप की वजह से अंतरराष्ट्रीय खरीदार भारतीय उत्पादों से दूरी बना रहे हैं।
घरेलू मोर्चे पर चुनौतियां
भारत में सोयाबीन की कीमतें चार साल के उच्चतम स्तर ₹65 से ₹66 प्रति किलो पर पहुंच गई हैं। इसकी मुख्य वजह 2025-26 की फसल में 17% की कमी है। भारत, जो आमतौर पर एक बड़ा निर्यातक है, अब अपनी मांग पूरी करने के लिए बेनिन, टोगो और नाइजीरिया जैसे देशों से सोयाबीन आयात करने पर मजबूर है।
लॉजिस्टिक और मार्जिन का दबाव
रेड सी (Red Sea) में जारी तनाव के कारण शिपिंग लाइन्स को लंबे और महंगे रास्तों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है, जिससे फ्रेट कॉस्ट (freight costs) काफी बढ़ गई है। इसके अलावा, यूरोप और पश्चिम एशिया के बाजार तक डिलीवरी में देरी ने प्रोसेसिंग कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन को बुरी तरह प्रभावित किया है। हालांकि, रेपसीड मील का निर्यात अभी भी इंडस्ट्री के लिए एक सहारा बना हुआ है, लेकिन निवेशकों की नजरें कंपनियों की लागत प्रबंधन क्षमता और ग्लोबल प्राइसिंग के सुधार पर टिकी रहेंगी।
