US Tariff Deadline: अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए भारतीय ज्वैलर्स की रेस, एक्सपोर्ट में भारी तेजी

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AuthorMehul Desai|Published at:
US Tariff Deadline: अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए भारतीय ज्वैलर्स की रेस, एक्सपोर्ट में भारी तेजी

मुंबई और सूरत के ज्वैलरी एक्सपोर्टर्स अमेरिकी 'Sanctioning Russia and Iran Act' के तहत लगने वाले संभावित **100%** टैरिफ से बचने के लिए सामान भेजने में तेजी ला रहे हैं।

भारतीय ज्वैलरी एक्सपोर्टर्स 18 अक्टूबर, 2026 की डेडलाइन से पहले अपना माल अमेरिका भेजने के लिए ओवरटाइम काम कर रहे हैं। इस अफरा-तफरी की मुख्य वजह 'Sanctioning Russia and Iran Act' है, जिसके तहत आयात पर 100% तक का भारी टैरिफ लगने का डर है। मुंबई के SEEPZ और सूरत के डायमंड हब में प्रोडक्शन और कार्गो क्लीयरेंस की रफ्तार काफी बढ़ा दी गई है ताकि माल समय रहते अमेरिकी कस्टम्स से क्लियर हो सके।\n\nअमेरिका भारतीय कटे और पॉलिश किए हुए हीरों का सबसे बड़ा बाजार है। छुट्टियों के सीजन (Holiday Season) को देखते हुए कंपनियां सप्लाई चेन बनाए रखने के भारी दबाव में हैं। अगर सामान डेडलाइन के बाद पहुंचा, तो उन पर लगने वाले भारी शुल्क से या तो उत्पाद बहुत महंगे हो जाएंगे या फिर कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा।\n\nइस जोखिम को कम करने के लिए एक्सपोर्टर्स ने अपनी रणनीति बदल दी है। कंपनियां अमेरिकी रिटेलर्स के साथ नए सिरे से कॉन्ट्रैक्ट्स पर बातचीत कर रही हैं ताकि टैरिफ लगने पर खर्च का बोझ कौन उठाएगा, यह स्पष्ट हो सके। इसके अलावा, माल को तुरंत शिप करने के बजाय, उसे अमेरिका स्थित फुलफिलमेंट सेंटर्स में पहले ही स्टॉक करने की कोशिश की जा रही है।\n\nसबसे ज्यादा खतरा 'लैब-ग्रोन डायमंड' (Lab-grown diamond) सेगमेंट पर है, जो अपने कम मार्जिन और वॉल्यूम-आधारित मॉडल के लिए जाना जाता है। जानकारों का कहना है कि निवेशकों को अब अमेरिकी प्रशासन के नियमों और कंपनियों के आगामी तिमाही नतीजों पर नजर रखनी चाहिए, जहां इन्वेंट्री होल्डिंग कॉस्ट और एक्सपोर्ट वॉल्यूम का असर साफ दिखेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.